विज्ञापन
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?
आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें।
तमिलनाडु में वी.जे.पी. पार्टी की बड़ी जीत के बाद राज्यपाल का बहुमत परीक्षण में देरी
हमारे देश के सबसे बड़े राज्य तमिलनाडु में 2026 के विधानसभा चुनावों में अभिनेता‑राजनीतिज्ञ वी.जे.पी. की टिवीके पार्टी ने अकेला सबसे बड़ा दल बनते हुए 108 सीटें जीतकर एथलीट‑राजनीति का नया रिकॉर्ड स्थापित किया। हालांकि, 234 में से आधे से अधिक सीटें ही किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं देतीं, जिससे गठबंधन के विकल्प बचे। इस पर राज्यपाल राजेन्द्र विष्णु अर्लेकर ने ‘बहुमत अभी तय नहीं हुआ’ का हवाला देकर सरकार गठन का निमंत्रण स्थगित कर दिया।
संवैधानिक दृष्टि से राज्यपाल को अपने विवेक में सरकार बनाते समय बहुमत का प्रमाण मांगने का अधिकार है, परन्तु इस अधिकार की सीमा अक्सर परस्पर विरोधी व्याख्याओं से घिरी रहती है। कुछ विद्वानों का तर्क है कि यदि एक पार्टी सबसे बड़ी है तो उसे बिना पूर्व फर्श परीक्षण के ‘शासकीय अवसर’ देना ही लोकतांत्रिक भावना के अनुकूल है। वहीं अन्य विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि बहुमत की पुष्टि न होने तक किसी को भी कार्यकारी शक्ति नहीं सौंपी जानी चाहिए, क्योंकि इससे अस्थायी या अल्पकालिक गठबंधनों को अस्थायी समर्थन मिल सकता है।
ऐसी स्थिति में प्रशासनिक सुस्ती स्पष्ट हो गई है। राज्यपाल के कार्यालय ने औपचारिक निमंत्रण को टालते हुए एक अनिश्चितकालीन ‘विचार‑विचार’ अवधि लागू कर दी, जिससे न केवल गठजोड़ के इच्छुक दलों को, बल्कि नागरिकों को भी शासन के खालीपन का अनुभव हो रहा है। इस ‘हिथी‑हिचकिचा’ से निचली स्तर की प्रशासनिक कार्यवाही में भी गिरावट दर्ज की जा रही है—सड़कें तेज़ी से मरम्मत नहीं हो रही, स्वास्थ्य सुविधाओं में नई नियुक्तियों में देरी, और बजट आवंटन की अंतिम मंजूरी का इंतजार।
नीति‑निर्माण प्रक्रिया पर इसका प्रभाव भी गंभीर है। जब तक स्पष्ट बहुमत स्थापित नहीं होगा, कोई भी महत्वाकांक्षी नीति, चाहे वह जल संरक्षण पर हो या शैक्षिक सुधार पर, ‘ड्रेपेज़न’ (सुरक्षा जाल) के नीचे फँसी रहेगी। इस बीच, जनता का भरोसा ढीला पड़ रहा है; चुनाव के बाद दो हफ्तों में ही लोगों ने कहा कि उनका वोट ‘विचलित हवा में' उड़ेगा, क्योंकि राज्य की कार्यकारी इकाई की कल्पना ही नहीं बन पा रही।
इतिहास बताता है कि 1999‑2000 में भी इसी तरह के मामलों में राज्यपाल ने जल्दबाज़ी में सरकार का चयन किया, जिससे बाद में अस्थायी गठबंधन टुटकर विधायी असफलता हुई थी। आज की स्थिति में, अगर राज्यपाल ने तत्क्षण बहुमत परीक्षण का आह्वान नहीं किया तो वह केवल दीर्घकालिक निराकरण का दांव नहीं, बल्कि ‘संवैधानिक जमीनी ठोस’ (Constitutional Grounding) को भी कमजोर कर रहा है। इसके अलावा, इस प्रकार का व्यवधान अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों की नजर में तमिलनाडु को ‘राजनीतिक अस्थिरता’ के ध्रुव में रख सकता है, जिससे आर्थिक विकास की गति घटेगी।
नागरिक सामाजिक संगठनों ने इस ‘विचली-डरावनी’ को लेकर टाउन‑हॉल मीटिंगों का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने ‘बहुमत सिद्धि का शीघ्र आदेश’ की मांग की। यदि प्रशासनिक प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया तो यह मामला न्यायालय तक पहुँच सकता है, जिससे सुप्रीम कोर्ट को भी इस संवैधानिक चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
संक्षेप में, तमिलनाडु में बहुमत प्रश्न केवल एक विधायी जाँच नहीं, बल्कि शासन‑रूपरेखा, प्रशासनिक उत्तरदायित्व और नागरिक विश्वास की परीक्षा है। राज्यपाल के निर्णय में यदि आवश्यक त्वरित फर्श परीक्षण नहीं किया गया, तो यह न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की गिरावट को दर्शाएगा, बल्कि नीति‑निर्माण एवं विकास को भी अस्थायी अंधेरे में ले जाएगा। इस समय, प्रशासन को चाहिए कि वह ‘विचार‑विचरण’ को ‘शासन‑सक्रियता’ में बदल दे, ताकि जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से वास्तविक कार्यों का एहसास हो।
Published: May 8, 2026