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Category: भारत

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तमिलनाडु: बार‑बार चुनावों का बोझ सहन नहीं, स्थायी सरकार बनाना सरकार की प्राथमिकता, डीएमके ने कहा

तमिलनाडु की वर्तमान सरकार ने आज सार्वजनिक मंच पर स्पष्ट कर दिया कि बार‑बार चुनावों की लागत‑प्रभावशीलता के चलते राज्य को स्थिर सरकार की आवश्यकता है। ड्राविडा मुनेत्र काजगम (डीएमके) के प्रमुख, मुख्यमंत्री मणि स्वामीनाथन, ने कहा कि लगातार चुनावी परिदृश्य न केवल राज्य के कोष को थका रहा है, बल्कि नीति‑निर्माण प्रक्रिया को भी बाधित कर रहा है।

वर्ष 2026 के असेंबली चुनावों को लेकर धारणा यह है कि दो‑तीन साल के भीतर फिर से मतदान कराना असाध्य आर्थिक बोझ उत्पन्न करेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, तमिलनाडु में एक नियमित विधानसभा चुनाव का खर्च लगभग 10,000 करोड़ रुपये हो सकता है, जिसमें सुरक्षा, चुनावी सूचना प्रौद्योगिकी और मतदान केंद्रों की स्थापना शामिल है। इस भार को उठाना राज्य की विकास‑आधारित बजट योजनाओं, खासकर जल, स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों में कटौती का कारण बन सकता है।

हालांकि, विपक्षी दलों ने इस दावे को राजनीतिक रैली के रूप में देख कर खारिज कर दिया है। तमिलनाडु कांग्रेस और बायजु सरकार के नेता इस बात पर जोर देते हैं कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कोई भी समझौता नहीं होना चाहिए, और चुनावी अंतराल को घटाकर ही सत्ता का वैधता बनी रहती है। उन्होंने सरकार को याद दिलाया कि चुनावों को स्थगित करने या उन्हें “स्थिरता” का बहाना बनाकर टालना संकल्पना में लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।

आगे बढ़ते हुए, राज्य प्रशासन ने इस मुद्दे पर किसी आधिकारिक रिपोर्ट या आर्थिक विश्लेषण का उल्लेख नहीं किया है। चुनाव आयोग द्वारा अभी तक कोई चुनावी कैलेंडर जारी नहीं किया गया है, जिससे राजनीतिक गणितियों को अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा है। इस असंतुलन का परिणाम है कि नीतिगत पहलें—जैसे जल-संकट समाधान के लिए प्रस्तावित कनेक्टेड जल‑सिंचाई नेटवर्क—अपनी गति खो रही हैं, क्योंकि प्रत्येक प्रशासनिक कदम को संभावित चुनावी परिणामों के संदर्भ में दोबारा परखा जाता है।

नीति‑निर्माण में इस “उत्पादन‑केंद्रित” दृष्टिकोण की कमी, संस्थागत सुस्ती का संकेत देती है। तमिलनाडु में कई सरकारी विभागों में एक स्थायी कार्यकारी शक्ति की कमी के कारण, योजना‑से‑कार्यान्वयन में अंतराल लगातार बढ़ रहा है। जब सरकार “स्थिरता” को प्राथमिकता देती है, तो अक्सर यह “जवाबदेही” की कीमत पर होता है—जवाबदेही रुकती नहीं, पर उसका वास्तविक परीक्षण चुनावी विमर्श में ही मिलता है।

सार्वजनिक प्रभाव के संदर्भ में, नागरिकों ने तेज़ी से बढ़ते सामाजिक‑आर्थिक दबावों को महसूस किया है। मूल्यवृद्धि, बेरोज़गारी और शिक्षा के खर्च में वृद्धि ने सामान्य जन को असहज कर दिया है। ऐसे माहौल में बार‑बार चुनावों का बोझ न सिर्फ वित्तीय रूप में, बल्कि सामाजिक‑राजनीतिक स्थिरता के रूप में भी तुच्छ नहीं माना जा सकता। लेकिन इस बिंदु को लेकर सरकार द्वारा दी गई कोई ठोस योजना सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है—सिर्फ मौखिक आश्वासनों से ही इस भावनात्मक मुद्दे को सुलझाने का दावा किया गया है।

निष्कर्षतः, तमिलनाडु में “स्थिर सरकार” की चाह में चुनावी प्रक्रिया को कम महत्व देना, लोकतांत्रिक सिद्धांतों के साथ एक जटिल समझौता बन जाता है। यदि प्रशासनिक जवाबदेही, नीति‑निर्माण की निरंतरता और नागरिक कल्याण को सच्चे अर्थ में संतुलित करना है, तो न केवल चुनावी खर्च को कम करने, बल्कि संस्थागत नवीनीकरण—जैसे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और राज्य के विविध विभागीय कार्यों की दक्षता—पर भी गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।

Published: May 8, 2026