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Category: भारत

तमिलनाडु चुनाव में वीजी के समर्थक समूह TVK ने एल्गोरिद्म से द्रविड़ राजनीति को चौंका दिया

दिसंबर 2025 से मार्च 2026 तक चलाए गए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में कई अप्रत्याशित मोड़ देखने को मिले। सबसे उल्लेखनीय था फ़िल्मी सितारे जोसेफ वि. (विजय) के प्रशंसकों द्वारा गठित "टीवीके" (TVK) का उभरना, जिसने एल्गोरिद्म‑आधारित अभियान और कलाकार की व्यक्तिगत छवि को मिलाकर द्रविड़ राष्ट्रवादी पार्टी (DMK) व अलोयी नरेंद्र मिश्र (AIADMK) को अस्थायी रूप से चुनौती दी।

TVK ने व्यापक डिजिटल डेटा संग्रह, मशीन‑लर्निंग‑संचालित मतदाता प्रोफ़ाइलिंग और त्वरित सोशल‑मीडिया संदेश प्रसारण को अपने मुख्य हथियार के रूप में अपनाया। हर जिले के स्थानीय मुद्दों को विश्लेषण कर लक्षित विज्ञापन और वीडियो संदेश भेजे गये, जिससे पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों के केंद्रीकृत विचारशीलता की जगह विभाजनकारी सूचनाएँ उभर पाईं। इस रणनीति ने खासकर चेन्नई, कोडाइकनाल और कुडलुरुपत्ती के कुछ हिस्सों में मतगणना के रुझान को उलटा दिया, जहाँ वोट‑शेयर में 3‑4 प्रतिशत की हलचल दर्ज हुई।

परिणामस्वरूप, TVK ने सीधे 7 सीटें जीतीं और कुल मतभंग में 12.6 प्रतिशत के आसपास का योगदान दिया। जबकि यह संख्या राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी नहीं लगती, अनाज के टुकड़े‑टुकड़े होने के कारण गठबंधन की गणना में इसकी भूमिका अधिक महत्व की बन गई। कुछ प्रमुख द्रविड़ गठबंधनों को कोलिडर—अन्यायपूर्ण—नीति‑निर्धारण की आपसी समझौतों को पुनः विचार करना पड़ा।

राज्य सरकार ने इस नई राजनीतिक शक्ति को "मनोरंजन उद्योग के प्रभाव का दुरुपयोग" माना और तमिलनाडु चुनाव आयोग को सख़्त नियामक दिशानिर्देश जारी करने का निर्देश दिया। हालांकि, चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया में काफी देरी रही, जिससे कई चुनाव‑आधारित डेटा‑विनियोगों को नियंत्रित करने के कानूनी साधन स्थापित नहीं हो सके। प्रशासनिक दस्तावेज़ों में यह भी कहा गया कि "डेटा‑ड्रिवन चुनावी रणनीतियों के बारे में स्पष्ट नीति अभी तक तैयार नहीं है", जिससे नीति‑निर्माण में मौजूदा संस्थागत सुस्ती स्पष्ट रूप से झलकती है।

विश्लेषकों का मत है कि TVK का उदय केवल एक व्यक्तिगत प्रभाव नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में डिजिटल प्रौद्योगिकी के उपयोग को लेकर मौजूदा नियामक असंगतियों का प्रतिबिंब है। सरकारी दावों के विपरीत, एजेंसी‑आधारित अभियान अब बड़े स्तर पर विवादित हो रहे हैं, जबकि चुनाव आयोग की निगरानी को एक बोझिल नौकरशाही तंत्र के रूप में देखा जा रहा है, जो तेज़ी से बदलते तकनीकी परिदृश्य के अनुरूप नहीं है।

भविष्य में, यदि डेटा‑स्वरूप चुनावी अभियानों को नियंत्रित करने की ठोस नीति नहीं बनायी गयी, तो द्रविड़ राजनीति के साथ-साथ बाकी भारतीय राज्यों में भी समान प्रकार की वैधता‑विचलन की संभावना बढ़ेगी। मौजूदा प्रशासनिक असंगतियों को दूर करने के लिए तत्काल नियामक ढाँचा, सख़्त प्रवर्तन तंत्र और पारदर्शी जवाबदेही प्रावधान आवश्यक हैं, अन्यथा "टेक‑समर्थित" राजनेता‑प्रशंसक समूहों की लहरें लोकतांत्रिक प्रक्रिया को निरंतर चुनौती देती रहेंगी।

Published: May 5, 2026