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Category: भारत

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तीन महिलाएँ, एक दौड़, और प्रशासन की कमियां: टाइम्स इंटरनेट हाफ मैराथन 2026 की वास्तविक कहानी

21 मई, 2026 को दिल्ली के लोटस टेंपल स्टेडियम और उसके आसपास के सड़कों पर आयोजित टाइम्स इंटरनेट हाफ मैराथन ने न केवल शारीरिक फिटनेस को मंच दिया, बल्कि प्रशासनिक असंगतियों को भी उजागर किया। इस वर्ष के आयोजन में तीन महिलाएँ—ऐशा वर्मा, एक आईटी कंपनी की मध्य‑स्तर प्रबंधिका, प्रिया सिंह, एक गृहिणी‑उद्यमी, और नेहा गोइंत, प्रथम वर्ष की मेडिकल छात्रा—लेखाकारों की सूची में प्रमुख स्थान पर थीं। उनके व्यक्तिगत संघर्ष व प्रेरणा की कहानी मीडिया के शीर्ष शिर्षक बन गई, परंतु उसी मंच पर सार्वजनिक सेवाओं की निकृष्ट व्यवस्था भी स्पष्ट रूप से सामने आई।

इन धावकों ने अपने-अपने सामाजिक पृष्ठभूमि से परे एकजुट होकर, नियमित प्रशिक्षण, पोषण परामर्श और सामुदायिक समर्थन के माध्यम से इस आधी मैराथन को लक्ष्य बनाया। ऐशा ने बताया कि अक्सर सीमित ऑफिस‑आवसरों के कारण उसे दौड़ना कठिन लगता था, परन्तु कंपनी की लचीली कार्य‑समय नीतियों ने उसे प्रशिक्षण का समय दिया। प्रिया ने कहा कि घरेलू जिम्मेदारियों के बीच वह अपनी छोटी बच्ची की देखभाल करते हुए भी रोज़ 5 किलोमीटर जॉगिंग करती थीं। नेहा ने अपने कॉलेज के खेल विभाग की कमी को उजागर करते हुए कहा कि यह दौड़ उसके लिए खेल विज्ञान के सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप में लागू करने का पहला अवसर थी। यह व्यक्तिगत संघर्ष, दर्शकों के सामने एक प्रेरणादायक छवि पेश करता है, परन्तु इवेंट के प्रबंधन में समान स्तर की तत्परता नहीं देखी गयी।

आयोजन की अनुमति दिल्ली नगरपालिका, दिल्ली पुलिस और खेल तथा युवा मंत्रालय से प्राप्त हुई थी। आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार, 30,000 प्रतिभागियों की सुरक्षा के लिए 2,500 पुलिस कर्मी, 150 एम्बुलेंस, और 40 प्रथम‑उपचार किटों की व्यवस्था की जानी थी। वास्तविकता में, अधिकांश धावकों को पानी के स्टैंड के बीच में ही पानी की कमी का सामना करना पड़ा। कई जगहों पर एम्बुलेंसें ट्रैफ़िक जाम के कारण समय पर पहुँच नहीं पाईं, और कुछ चोटिल धावकों को स्वयं ही मदरिएटर्स के कंधे पर ले जाना पड़ा। इस असमतुल्य तैयारी का मुख्य कारण एक असंगत समन्वय समिति थी, जहाँ नगरपालिका के अधीक्षक और पुलिस अधीक्षक के बीच बैठकें अप्राप्त रही।

स्थानीय प्रशासन ने बाद में कहे गए बयान में “सभी आवश्यक व्यवस्थाओं को समय पर लागू किया गया” का उल्लेख किया, परन्तु साक्ष्य इसके विपरीत थे। नागरिक समूहों ने इस बात को लेकर दिये गए बहु‑पहलुओं वाले प्रश्नावली में बताया कि कई अभ्यस्त सड़क साझेदारों को रूटिंग सूचना नहीं मिली, जिससे प्रारंभिक घंटे में वाहन‑आवाज में अराजकता बनी। इसके अलावा, शौचालय सुविधाओं की कमी ने धावकों को असुविधा में डाल दिया, जबकि समान आकार के पिछले वर्ष के इवेंट्स में इस समस्या नहीं थी। यह दर्शाता है कि नीतियों के कागजी रूप में पूर्णता तो थी, परन्तु निष्पादन में संस्थागत सुस्ती स्पष्ट रूप से दिखाई दी।

आर्थिक दृष्टिकोण से, इस इवेंट ने कुल 65 करोड़ रुपये का प्रायोजकत्व तथा स्थानीय व्यवसायों से बिक्री कराए। परन्तु सार्वजनिक खर्च की पारदर्शिता पर सवाल उठता है। कई सार्वजनिक निधियों के उपयोग को लेकर RTI के माध्यम से पूछताछ में यह पता चला कि 12 करोड़ रुपये की सुरक्षा व्यवस्था का बजट केवल 8 करोड़ रुपये के वास्तविक व्यय से कम था। यह अंतर न केवल वित्तीय अनुशासन के अभाव को दिखाता है, बल्कि सरकारी दावों के विरुद्ध प्रत्यक्ष विरोध भी प्रस्तुत करता है।

सारांशतः, जबकि ऐशा, प्रिया और नेहा की व्यक्तिगत उपलब्धियों को सराहा जाना चाहिए, उन्हें राज्य‑नियोजित बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में व्याप्त प्रशासनिक लापरवाही के साथ नहीं आँका जा सकता। यह घटना नीति‑निर्धारण में अभाव, कार्यान्वयन में अति‑सरलीकरण, और जवाबदेही में व्यवधान की सच्ची तस्वीर पेश करती है। यदि भविष्य में बड़े‑पैमाने के खेल आयोजन को सत्यमान और सुरक्षित बनाना है, तो फॉर्मूला को बदलना आवश्यक है: योजनाबद्ध समन्वय, सटीक बजट ट्रैकिंग, और संभावित विफलताओं के लिए त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई। केवल तब ही ऐसी आधी मैराथन महिला प्रेरणा के साथ-साथ प्रशासनिक दक्षता की दुविधा को समाप्त कर सकती है।

Published: May 7, 2026