जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: भारत

डिलजीत दोसांझ ने कैल्गरी में कॉन्सर्ट रोककर प्रो‑ख़लिस्तान झंडे दिखाने वाले प्रशंसकों की निंदा की

कैल्गरी, कनडा – पंजाबी गायक‑अभिनेता डिलजीत दोसांझ ने 2 मई को अपने संगीत कार्यक्रम को आधा रास्ता रोक दिया, जब मंच के किनारे कई दर्शकों ने प्रोकख़लिस्तान ध्वज लहराए। कलाकार ने तत्क्षण माइक्रोफोन सँभालते हुए उन पर ‘जिन्ने झण्डे दिखाने दिलख़ुशी चालो’ का कठोर प्रहार किया और कहा कि उनका ध्यान केवल पंजाब के विकास पर ही रहेगा।

दोस्ताना माहौल में शुरू हुआ यह कार्यक्रम, जब दर्शकों के कुछ हिस्से ने किधर‑किधर अपने हाथों में ख़लिस्तान समर्थक बैनर दिखाए, तो दोसांझ ने तुरंत मंच से नीचे उतर कर भारतीय प्रशंसकों एवं मीडिया को यह बतलाया कि उनका उद्देश्य ‘पंजाब के मुद्दों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लाना’ है, न कि किसी विभाजनवादी आन्दोलन को बढ़ावा देना। इस घटना पर कलाकार ने अपने पिछले तेज़ी से चल रहे विवादों का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ और ‘द टुनाइट शो’ जैसे भारतीय टेलीविजन कार्यक्रमों पर प्रदेश‑विशेष समस्याओं को उठाया था।

इस प्रसंग का प्रवाह भारत के विदेश मामलों, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक नीतियों के कई प्रश्नों को उजागर करता है। बहिर्मान्य भारतीय राजनयिकों ने पहले भी ख़लिस्तान समर्थक संगठनों को ‘विदेशी‑आधारित उग्रवादी’ के रूप में वर्गीकृत किया है, जबकि उनके खिलाफ कार्रवाई अक्सर होस्ट देशों की विधि‑व्यवस्था के दायरे में सीमित रही है। इस घटना में कनडा के स्थानीय कानून व्यवस्था पर कोई प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया नहीं देखी गई, परन्तु भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपमानजनक प्रतीकों के प्रयोग को ‘कुशल कूटनीति’ के माध्यम से रोकने की आवश्यकता पर बल दिया है।

इसी बीच, घरेलू स्तर पर कई नीति‑निर्माताओं और नागरिक समाज के संगठनों ने कहा कि विदेश में भारतीय कलाकारों को ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़े तो यह न केवल व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के लिये, बल्कि राष्ट्रीय छवि के लिये भी जोखिमपूर्ण हो सकता है। उन्होंने कहा कि भारत को अपने ‘डायस्पोरा‑एंगेजमेंट’ रणनीति को पुनर्समीक्षा करनी चाहिए, जिससे प्रवासियों के बीच उग्र विचारधारा को समर्थन मिलने से पहले ही पहचान कर निरोधात्मक उपाय अपनाए जा सकें।

डिलजीत दोसांझ का यह कदम, जबकि व्यक्तिगत अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है, फिर भी यह दर्शाता है कि सार्वजनिक हस्तियों को भारत‑विदेश संबंधों में उत्तरी अमेरिकी मंचों पर भी ‘जैज’ क्या है, इसकी समझ जरूरी है। यदि सरकार अपने सुरक्षा प्रोटोकॉल, विदेशी सांस्कृतिक कार्यक्रमों की निगरानी तथा कूटनीतिक संवाद को सुदृढ़ नहीं करती, तो ऐसी घटनाएँ भविष्य में और बढ़ सकती हैं, जिससे न केवल भारतीय कलाकारों की स्वतंत्रता, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा भी दिग्बहाल हो सकती है।

Published: May 3, 2026