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Category: भारत

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डॉरडो ने दिल्ली में सीबीआरएन केंद्र खोला: नीति‑व्यवस्था की लापरवाही पर सवाल

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डॉरडो) ने 7 मई 2026 को नई दिल्ली में रासायनिक‑जीवाणु‑रेडियोलॉजिक‑न्यूक्लियर (सीबीआरएन) प्रशिक्षण व त्वरित प्रतिक्रिया केंद्र का उद्घाटन किया। यह सुविधा ‘रासायनिक व पार्थिव आपदाओं के लिए तत्परता’ के आधिकारिक बयान के हिस्से के रूप में प्रस्तुत की गई, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा को संभावित परमाणु‑जीवाणु‑रासायनिक ख़तरों से बचाने की बात की गई।

ऐसे केंद्र की आवश्यकता पर आधिकारिक तौर पर कोई नई सुरक्षा‑पथेरी नहीं बताई गई, जबकि पिछले दशकों में द्वादीपीय रिपोर्टों में लगातार कहा गया था कि भारत में सीबीआरएन तंत्र पंखा‑पंखा बिखरता रहा है। यह प्रश्न उठता है कि इस ‘नवीनतम’ पहल को केवल 2026 में ही क्यों अपनाया गया, जबकि 2016‑2024 के बीच कई बार संसद में इस विषय पर व्यवस्था‑संबंधी प्रश्न पूछे गए थे।

संबंधित पक्षों – रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय एवं राष्ट्रीय आपदाप्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के बीच समन्वय का स्वरूप अभी तक स्पष्ट नहीं है। आधिकारिक ज्ञापन में कहा गया है कि डॉरडो ‘सभी मंत्रालयों के साथ मिलकर’ कार्य करेगा, किन्तु व्यावहारिक स्तर पर जिम्मेदारी का बंटवारा अस्पष्ट बना हुआ है। इस अनिश्चितता के कारण, स्नातक‑स्तर के वैज्ञानिकों और चिकित्सा कर्मियों को भी अक्सर दो‑तीन एजेंसियों के ‘समीकरण‑परिचालन’ के बीच फँसा देखा गया है।

केंद्र की बजट घोषणा के अनुसार, इस परियोजना में लगभग 350 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। अनेक विशेषज्ञों के अनुसार, इस राशि की तुलना में पिछले दस वर्षों में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन के लिये अनुमोदित बजट का हिस्सा मात्र एक‑तीहाई था। इस असमानता से यह स्पष्ट होता है कि कई वर्षों से ‘सांस्थानिक सुस्ती’ और ‘राजनीतिक शीतकाल’ के कारण आवश्यक बुनियादी ढांचा तैयार नहीं हो सका।

नीति‑निर्माण के संदर्भ में एक और बड़ी खामि यह है कि इस केंद्र की कार्यक्षमता के लिये एक स्वतंत्र निरीक्षण समिति या सार्वजनिक रिपोर्टिंग तंत्र स्थापित नहीं किया गया है। ऐसी पारदर्शिता की कमी न केवल नागरिक जवाबदेही को घटाती है, बल्कि सार्वजनिक भरोसे को भी धूमिल करती है।

व्यावहारिक तौर पर, यदि किसी भविष्य में परमाणु‑योग्य हमले अथवा रासायनिक हमले की स्थिति उत्पन्न होती है, तो इस केंद्र की प्रभावशीलता कई कारकों पर निर्भर करेगी: (i) रक्षा मंत्रालय‑गृह मंत्रालय‑स्वास्थ्य मंत्रालय के बीच तेज़ तालमेल, (ii) प्रथम‑पंक्ति में स्थित मेडिकल यूनिट्स का तत्परता स्तर, और (iii) जनसंचार व जोखिम सूचना के लिये एक स्पष्ट प्रोटोकॉल। वर्तमान में इन तीनों स्तंभों में से कोई भी औपचारिक रूप से मान्य नहीं हो पाया है।

सारांशतः, दिल्ली में डॉरडो द्वारा स्थापित सीबीआरएन केंद्र को प्रशंसा के साथ-साथ गंभीर प्रश्न‑उत्पन्न करने वाली नीति‑व्यवस्था की लापरवाही के रूप में देखना आवश्यक है। अभ्यस्त सरकारी जलसेनों को अब केवल घोषणा‑परिणाम नहीं, बल्कि प्रभावी कार्यान्वयन, सच्ची अंतर‑एजेंसी सहयोग और नागरिकों के प्रति स्पष्ट उत्तरदायित्व के साथ कार्य करना होगा, तभी इस तरह की महँगी सुविधा का वास्तविक मूल्य मिल सकेगा।

Published: May 7, 2026