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Category: भारत

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डेमोक्रेटिक लेफ़्ट गठबंधन की डीएमके ने कांग्रेस के बगल में बैठने से मना किया, लोकोत्री में जगह विवाद गरम

नई दिल्ली – 9 मई, 2026 को लोकोत्री में एक अनपेक्षित प्रोटोकॉल विवाद गरम हो गया जब तमिलनाडु की प्रमुख पार्टी डेमोक्रेटिक लेफ़्ट गठबंधन (डीएमके) ने स्पीकर को लिखित सूचना दे दी कि वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बगल में बैठने को अस्वीकार कर रहे हैं। इस कदम का कारण, पार्टी के प्रतिनिधियों ने कहा, कांग्रेस के साथ रणनीतिक मतभेद और गठबंधन में असंगति का प्रतीकात्मक स्वर बनना है।

रिपोर्टों के अनुसार, डीएमके के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने इस निर्णय को “सामूहिक पहचान और पार्टी की स्वायत्तता की रक्षा” के नाम पर पेश किया। उन्होंने बताया कि कांग्रेस के साथ निकटतम बैठना केवल एक प्रतीकात्मक संकेत नहीं, बल्कि एक संभावित नीति‑संकट की ओर इशारा करता है, जहाँ दोनों दलों के साझा मंच पर विभिन्न मतभेदों को अनजान रहने का जोखिम है।

वहीं, लोकोत्री के स्पीकर (वर्तमान में ओम बिरला) की कार्यालय ने इस मांग को “सत्र के प्रवेश‑पत्र में निर्धारित मानक नियमों के तहत ही तय किया गया” कहा। उन्होंने जोड़ते हुए कहा कि किसी भी पार्टी को बैठने की व्यवस्था में मनमाने बदलाव करने की अनुमति नहीं है, जब तक कि स्थापित प्रोटोकॉल में आधिकारिक संशोधन न किया गया हो।

इस बिंदु पर संसद के प्रशासनिक यंत्र की चुप्पी भी सवाल उठाती है। दस साल पहले उठाए गए “सिटिंग एग्रिमेंट” पर अभी भी स्पष्ट नीतियों की कमी है, जिससे प्रत्येक सत्र में इसे दोबारा तय करने की नौकरशाही प्रक्रिया दोहराती है। इस ढील के कारण न केवल संसद के कार्यकुशलता में बाधा आती है, बल्कि सार्वजनिक भरोसे को भी धूमिल करती है, क्योंकि आम जनता के लिए ये दिखता है कि संसद की फर्श पर भी “संसदीय इंटीरियर डिज़ाइन” पार्टी के राजनीतिक गड़बड़ियों की तरह ही अस्थिर है।

नीति‑निर्माताओं द्वारा इस मुद्दे पर कोई ठोस समाधान नहीं प्रस्तुत किया गया है। जबकि सरकार ने कई बार “सार्वजनिक संस्थानों की जवाबदेही” के लिए नए मानक स्थापित करने की घोषणा की है, इस तरह के बुनियादी दायित्वों में धीमी गति और “संस्थागत सुस्ती” स्पष्ट रूप से झलकती है।

नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संसद का मुख्य कार्य‑क्षेत्र, यदि नीतियों के निर्माण की जगह जगह‑बांट का मुठभेड़ बन जाता है, तो आम जनसंख्या को अपने प्रतिनिधियों की क्षमता पर संदेह होगा। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति नागरिक जागरूकता में गिरावट और निराशा का माहौल बन सकता है।

बिल्कुल, इस विवाद को हल करने की दिशा में संसद प्रशासन ने एक विशेष समिति गठित करने का संकेत दिया है, परन्तु वास्तविक कार्यवाही में आगे की रफ़्तार अभी तक स्पष्ट नहीं हुई। यह देखना बाकी है कि यह “पर्याप्त समय” का इंतज़ार है या फिर नीति‑निर्माताओं की “धीरज” का परीक्षा‑स्थल।

Published: May 9, 2026