ट्राइअनोमॉल कांग्रेस ने ‘सिंगह’ अजय पाल शर्मा की निलंबन की माँग, फाल्ता में पुनः मतदान को लेकर चुनावी धांधली के आरोप
वेस्ट बंगाल के दक्षिणी भाग में स्थित फाल्ता गोलकेंद्र में पिछले कुछ दिनों से चुनावी अड़चनें बनी हुई हैं। 2‑5 मई 2026 को हुए पुनः मतदान के बाद, त्रिणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के वरिष्ठ नेता कुन्ला घोष ने तत्कालीन आयुक्त, प्रो़भासी अधिकारी अजय पाल शर्मा, जिन्हें ‘सिंगह’ के नाम से लोकप्रियता मिली है, के खिलाफ निलंबन की मांग कर स्थानीय प्रशासन पर तीव्र आलोचना दर्ज की।
शर्मा को इस बार फाल्ता में पुनः मतदान कराने के कारण ‘धांधली’ के प्रमुख आरोपी माना जा रहा है। चुनाव प्रकोष्ठ के प्रारम्भिक आँकड़े के बाद, कई असामान्य मतपत्रों और निष्क्रिय मतदान केंद्रों की रिपोर्ट सामने आई, जिससे राज्य चुनाव आयोग को पुनः मतदान का आदेश देना पड़ा। टीएमसी ने त्वरित रूप से इस प्रक्रिया को “जवाबदेही‑हीन” और “प्रशासनिक चूक” की शब्दावली में वर्णित किया।
कुन्ला घोष ने बताया कि पुनः मतदान का आदेश सिर्फ तकनीकी त्रुटियों के कारण नहीं, बल्कि कुछ आयुक्त-स्तरीय अधिकारियों द्वारा “विरुद्ध पक्ष के पक्ष में” कार्यवाही का परिणाम है। उन्होंने कहा, “श्री शर्मा ने अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता को ‘सिंगह’ टैग के पीछे छुपाते हुए, चुनाव प्रक्रिया में बुनियादी सिद्धांतों को ही नुकसान पहुँचाया है।” इस बयान के बाद कई टीएमसी प्रवक्ता ने अनुरूप बयान जारी कर संभावित निलंबन की मांग को दोहराया।
पार्टी के इस आरोप के बीच, राज्य चुनाव आयोग ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि वह “स्थानीय स्तर पर किसी भी अनियमितता की पूर्ण जांच कर रीकैप” करेगा और “न्यायसंगत प्रक्रिया के अनुसार ही उचित कार्रवाई की जाएगी”। हालांकि, आयोग की इस प्रतिबद्धता को कई स्वतंत्र बहिसमीक्षक “सुनहरा वाक्य” कह कर डांक रहे हैं, क्योंकि पहले भी ऐसी परिस्थितियों में निष्क्रियता और धीमी कार्रवाई का अनुभव रहा है।
वर्तमान में इस विवाद के कारण फाल्ता में राजनीतिक माहौल अस्थिर हो गया है। स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही को लेकर सार्वजनिक प्रश्न उठ रहे हैं: क्या आयुक्त के पास पुनः मतदान का अधिकार केवल प्रक्रियात्मक त्रुटियों को सुधारने के लिए था, या यह एक नियोजित राजनीतिक हस्तक्षेप था? इस पर्त्येक में, राज्य सरकार की नीति‑निर्माण प्रक्रिया की कमजोरी स्पष्ट हो रही है, जहाँ चुनाव‑परिवर्तित अक्षमता और संस्थागत सुस्ती दोनों ही एक साथ सामने आ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाने और एन्क्लेविंग एजेंसियों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संविधानिक सुधार आवश्यक हैं। यदि इस मामले में भी उच्चतम न्यायिक या विधायी हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो यह प्रकरण प्रशासनिक जवाबदेही के सिद्धांतों को कमजोर कर सकता है और भविष्य में समान घटनाओं की संभावनाओं को बढ़ा सकता है।
जैसे ही फाल्ता में पुनः मतदान का परिणाम घोषित होगा, यह देखना होगा कि टीएमसी की निलंबन की माँगें किस हद तक कारगर होंगी और क्या इस विवाद से चुनावी व्यवस्था में कोई बुनियादी सुधार निकलेगा। वर्तमान में, सार्वजनिक भरोसा ही इस जहाज़ का एकमात्र लंगर है, और उसे तब तक बचाया नहीं जा सकता जब तक कि प्रशासनिक संस्थाएँ अपने कर्तव्यों को संकल्पित रूप से निभाएँ।
Published: May 3, 2026