जंगल में दो साल के बच्चे की 20‑घंटे की जीवटता: प्रशासन की चुप्पी और जवाबदेही की कमी पर सवाल
एक दो साल के छोटे लड़के ने लगभग बीस घंटे एक जंगली जानवरों से घिरे वन में अकेले घूमते हुए जीवन पनपाया, जब उसके पिता ने माँ की हत्या कर दी और उसे वहीं छोड़ दिया। बच्चा पुलिस द्वारा ड्रेनेज पंक्तियों में मिला, कमजोर, निर्जलित लेकिन जीवित; अब वह बाल कल्याण बोर्ड की देखरेख में है। पिता को हिरासत में ले लिया गया। यह घटना न केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी को उजागर करती है, बल्कि राज्य की कई सार्वजनिक सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा तंत्रों की जड़ता को भी सामने लाती है।
घटना होने के बाद पुलिस ने लगभग दो घंटे में ‘खोज‑संकट’ यूनिट को भेजा, लेकिन वे भी वन विभाग के सीमित-स्तर के गश्तों से आगे नहीं बढ़ सके। वास्तविक समय में जंगल के भीतर संपर्क साधने व सूचना प्रसारण की कोई व्यवस्थित योजना नहीं थी। यह स्पष्ट है कि वन्यजीव संरक्षण के नाम पर स्थापित ट्रैकिंग डिवाइसों का उपयोग या नागरिकों की अनुज्ञप्तिप्राप्त सहायता साधनों की कमी ने बचाव कार्य में देरी की।
बच्चे की स्थिति गंभीर थी – निर्जलीकरण, हाइपोथर्मिया, तथा वन के विषाक्त जीवों के संपर्क में आना। ऐसे नाजुक मामलों में तत्काल चिकित्सीय सहायता की व्यवस्था होनी चाहिए, परन्तु अस्पतालों में बाल रोग विभागों के बुनियादी उपकरणों की कमी, और आपातकालीन डैशबोर्ड पर बच्चा‑सुरक्षित संकेतकों का अभाव, एक बार फिर प्रशासनिक अति‑आलस्य को रेखांकित करता है।
विधानसभा में बाल अधिकार अधिनियम के प्रावधानों की बहस अक्सर शब्दों में सीमित रहती है, जबकि इस तरह के दुरुपयोगी मामलों में प्राथमिक रोकथाम, रिपोर्टिंग तंत्र एवं सख्त निगरानी के उपाय अभी भी अधूरे हैं। इस घटना से यह प्रश्न उठता है कि क्यों ‘कोई गवाह नहीं’ जैसी कहानियाँ वास्तविकता में बदल रही हैं, जहाँ बच्चों के जीवन को ‘कायम के लिए भूलभुलैया’ बना दिया गया है।
दोष आरोपित पिता के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज कर, अदालत ने प्रतिबंधात्मक उपाय अपनाए, फिर भी साक्ष्य संग्रह, forensic‑सम्बन्धी प्रक्रिया एवं बाल कल्याण प्री‑एडज्यूडिक्शन की तैयारियों में अक्षम्य त्रुटियाँ सामने आईं। यह दर्शाता है कि बच्चों के खिलाफ हिंसा में ‘संजाल‑बद्ध’ संस्थागत सहकार नहीं, बल्कि टुकड़े‑टुकड़े कार्यवाई ही मिलती है।
सारांशतः, यह घटना एक ‘अभूतपूर्व’ साहसिक कहानी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, नीति‑निर्माण में अस्पष्टता एवं सुदृढ़ उत्तरदायित्व तंत्र के अभाव की चेतावनी है। बुनियादी उत्तरदायित्व – हर बच्चे को सुरक्षित घर, हर अभिभावक की कड़ी देखरेख, और हर राजकीय विभाग की तत्पर प्रतिक्रिया – केवल घोषणात्मक नहीं, बल्कि कानूनी बाध्यता होनी चाहिए। तभी ऐसी ‘जंगल‑अभियान’ को ‘रहस्य‑आधारित’ कहावते बनाकर राष्ट्रीय ख़बरों में नहीं भरना पड़ेगा।
Published: May 4, 2026