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Category: भारत

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चुनाव में हिंसा को रोकने के लिए आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार करने का आग्रह: सीईसी ज्ञानेश कुमार

भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार ने आज सुबह इस सप्ताह के दो बार हुए मतदान‑अवधि की हिंसा के बाद एक कड़ा नोटिस जारी किया। उन्होंने कहा, “जिन्हें हिंसा में लिप्त पाया गया है, उनके खिलाफ त्वरित और प्रभावी गिरफ्तारी की जानी चाहिए, वरना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का वैधता संकट में पड़ जाएगी।” यह बयान आगामी राष्ट्रीय चुनावों के घाटे में एक महत्वपूर्ण चेतावनी बन गया।

पिछले दो सप्ताह में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में चुनाव अभियानों के दौरान चुनावी कर्मचारियों, धावकों और जनसमुदाय पर शारीरिक हमला, मालवेयर और धन संग्रह के आक्रमण की कई घटनाएँ दर्ज हुईं। पुलिस रिपोर्टों के अनुसार, सबसे गंभीर चोरी‑भेज़ी घटना त्रिपुरा जिले के एक मतदान केंद्र में हुई, जहाँ दो पुलिस अधिकारी घायल हुए और मतदान मशीनें क्षतिग्रस्त हुईं। इन घटनाओं को रोकने के लिये राज्य सरकारें आपातकालीन सुरक्षा आदेश जारी कर चुकी थीं, परन्तु कार्यान्वयन में कई खामियाँ स्पष्ट रूप से रह गईं।

सीईसी ने इन घटनाओं को ‘पर्याप्त सुरक्षा प्रावधानों की अनुपस्थिति’ और ‘संबंधित प्रबंधकीय अधिकारियों के उत्तरदायित्व की ढील’ के रूप में वर्गीकृत किया। उन्होंने विशेष आपातकालीन स्वर से राज्य चुनाव अभियंत्रण अधिकारियों (ECO) को निर्देश दिया कि “जाँच‑प्रक्रिया का प्रत्येक चरण मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के अनुरूप होना चाहिए, और अगर कोई दोषी पकड़ा गया तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही तेज़ी से शुरू की जानी चाहिए।”

प्रशासनिक प्रतिक्रिया में अभी तक स्पष्टता नहीं दिखी। कई राज्य पुलिस विभागों ने ‘अधिक संसाधन नहीं मिलने’ और ‘स्थानीय राजनीतिक दबाव’ को मुख्य कारण बताया, जबकि चुनाव आयोग के नियामक अधिकार को “जिम्मेदारी से बाहर” घोषित कर दिया। ऐसी स्थिति में राष्ट्रीय चयन आयोग द्वारा अपनी निगरानी क्षमता विस्तारित करने के बारे में प्रस्तावित ‘विकल्पिक निगरानी इकाई’ (OVU) का स्वरुप अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है।

नीति‑निर्माण में स्पष्ट अंतराल और संस्थागत सुस्ती की गहरी जड़ें इस तथ्य से उजागर होती हैं कि चुनावी सुरक्षा के लिए पूर्व में जारी “डिजिटल सुरक्षा फ्रेमवर्क 2023” के प्रमुख बिंदु—जैसे कि त्वरित प्रतिक्रिया टीम (RRT) का गठन और नजदीकी निगरानी हेतु मोबाइल सिट्रन—अंततः पेपर पर ही रह गए। इससे यह स्पष्ट है कि केवल औपचारिक नियमों की घोषणा से लोकतांत्रिक प्रक्रिया सुरक्षित नहीं रहती; उन्हें जमीन पर उतारने में प्रशासनिक इच्छा‑शक्ति का अभाव सबसे बड़ी बाधा बन गया है।

वर्तमान में, कई नागरिक अधिकार संगठनों ने सीईसी के इस बयान के समर्थन में एक राष्ट्रीय याचिका दायर की है, जिसमें ‘हिंसा में लिप्त सभी व्यक्तियों की तुरंत सशस्त्र गिरफ्तारी, साथ ही अपराधी राजनीति के स्रोतों की विस्तृत जाँच’ की माँג है। यह विकास नीति‑निर्माताओं को इस ओर इशारा करता है कि चुनाव‑संबंधी अपराध को केवल “संघीय अपराध” का वर्गीकरण नहीं करके, उसके दायरे को राज्य‑स्तर की न्यायिक प्रवर्तन में बदलना आवश्यक है।

संक्षेप में, ज्ञानेश कुमार की कड़ी भाषा न केवल प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बनी रहेगी जब ‘हिंसा के प्रवर्तकों के विरुद्ध त्वरित, निरपेक्ष और दण्डात्मक कार्रवाई’ को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाये। यह संदेश तभी प्रभावी रहेगा जब जुड़े सभी एजेंसियों—राज्य चयन आयोग, पुलिस, और स्थानीय प्रशासन—सभी स्तरों पर अपने-कर्तव्यों का निरूपण कर सकें, न कि केवल कागज़ी औपचारिकताओं में।

Published: May 7, 2026