जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: भारत

कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड में तापमान में गहरी गिरावट: बर्फ‑बारिश ने प्रशासनिक तत्परता को परखा

२५ मई 2026 को उत्तर भारत के तीन प्रमुख पहाड़ी राज्य – जम्मू‑कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड – में असामान्य ठंड और बारीश ने नागरिकों की दैनिक चाल-चलन को बाधित कर दिया। राष्ट्रीय मौसम विज्ञान केंद्र (IMD) के अनुसार, इन क्षेत्रों में तापमान दो अंकों तक गिरकर शून्य से नीचे पहुंच गया, जबकि कई स्थानों पर बर्फबारी की सूचना मिली।

इस मौसमी घटनाक्रम को लेकर केंद्र और राज्य स्तर पर आपदा प्रबंधन दलों ने त्वरित प्रतिक्रिया शुरू की। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने पांच शहरों में आपातकालीन आश्रय खोले, तथा नॅशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स (NDRF) की 150 टीमों को जोखिमग्रस्त इलाकों में तैनात किया। हिमाचल के शिमला, कश्मीर के श्रीनगर और उत्तराखंड के देहरादून में मौसम विभाग की चेतावनी के बाद स्कूलों को बंद कर दिया गया और कई हाईवेज़ पर वाहन चालकों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने का निर्देश दिया गया।

परंतु, जहाँ प्रशासन का त्वरित कार्यदर्शन प्रशंसनीय है, वहीं कई मूलभूत प्रश्न भी सामने आते हैं। बर्फ‑बारिश के पूर्व-संकेत प्राप्त होने के दो सप्ताह बाद ही स्थानीय प्रशासन ने चेतावनी जारी की, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समय पर सूचना प्रसार प्रणाली में देरी रही। त्योहारी सीजन के अंत में इन्फ्रास्ट्रक्चर की देखरेख में लापरवाही, विशेषकर बर्फ‑पानी से निपटने के लिये स्थापित निकासी सुविधाओं का अभाव, नागरिकों को असहज स्थिति में डाल रहा है।

तीन राज्यों में मौसमी बारीश ने सड़कों के फटने, बिजली हटने और ग्रामीण क्षेत्रों में फसलों पर बुरे प्रभाव का कारण बना। बिहार में 2024 के बाद से पहली बार उत्तराखंड के कई वार्डों में 30 % तक बिजली कटौती देखी गई, जबकि हिमाचल प्रदेश में कई गांवों में जल आपूर्ति भी बाधित रही। इन घटनाओं ने जलवायु परिवर्तन के प्रति मौजूदा नीति‑निर्माण की सीमाओं को उजागर किया। वर्तमान में, जलवायु अनुकूलन योजनाओं में स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने के लिये पर्याप्त निधि और तकनीकी समर्थन नहीं दिया गया है, जिससे क्षमताहीन प्रबंधन ढांचा ही बुनियादी आपदा प्रतिक्रिया का मुख्य आधार बन जाता है।

पर्यावरणीय विशेषज्ञों का मानना है कि वार्षिक बर्फ‑बारी की अनियमितता के साथ मौसमी तापमान में तीव्र उतार-चढ़ाव को देख कर, मौजूदा जलवायु नीति में दीर्घकालिक अनुकूलन उपायों की कमी स्पष्ट होती है। उनके अनुसार, जमीनी स्तर पर जलवायु‑स्मार्ट कृषि, बर्फ‑संचयन तालाब और ऊंचाई-आधारित सड़कों की नियमित मेंटेनेंस जैसे उपाय दिये नहीं जा रहे हैं।

प्रशासनिक आलोचना के साथ‑साथ, यह भी ध्यान देने योग्य है कि कई जिलों में आपदा प्रबंधन योजना का दस्तावेज़ीकरण अधूरा है, और प्रत्येक इकाई की कार्यक्षेत्रीय जिम्मेदारियों की स्पष्टता नहीं है। इस कारण से अक्सर कई मंजूर प्रोटोकॉल को फील्ड में लागू नहीं किया जा पाता, जिससे नागरिकों के भरोसे में गिरावट आती है।

सरकार ने इस पर "प्रभावी और त्वरित कार्यवाही" का आश्वासन दिया है, परंतु वास्तविक सुधार तभी संभव है जब जलवायु परिवर्तन को एकीकृत नीति‑निर्माण के केंद्र में रखा जाए, बजट आवंटन को कारगर बनाया जाए और मौसमी कठिनाइयों के लिये पूर्व‑सतर्कता के लिये स्थानीय निकायों को सशक्त बनाया जाए। वर्तमान में, प्रशासनिक जवाबदेही का अभाव और संस्थागत सुस्ती ही ऐसी ही प्राकृतिक आपदाओं में नागरिकों को निरंतर झंझट में डाल रहा है।

समग्र तौर पर, कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड में इस गिरते तापमान और बर्फ‑बारिश ने एक बार फिर दिखा दिया कि प्राकृतिक घटनाओं को केवल रिएक्टिव उपायों से नहीं, बल्कि रणनीतिक, पूर्व‑नियोजित और सामाजिक-आर्थिक रूप से समावेशी दृष्टिकोण से ही संभाला जा सकता है। समय आ गया है कि नीति‑निर्माताओं और प्रशासनिक मशीनरी दोनों ही इस नई वास्तविकता को अपनाएँ, वरना "थर्मामीटर ने जिम में जाकर वजन घटाने का दावा किया"—जैसे ही सरकार ने ठंडी में आवाज़ उठाई, उसे सुनने के लिये भी थर्मामीटर को बढ़िया डीसीएड की जरूरत होगी।

Published: May 5, 2026