जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: भारत

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

कश्मीरी पंडितों ने राहत राशियों के 'खाद्य सुरक्षा अधिनियम' में समावेश का विरोध कर षड्यंत्र का आरोप किया

जम्मू‑कश्मीर, 5 मई 2026 – जमीनी स्तर पर निरंतर आवाज़ उठाते हुए कश्मीरी पंडित संगठनों ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) में घरेलू राहत राशियों के समावेश को निरस्त करने की मांग की। उन्होंने इस कदम को सामूहिक षड्यंत्र का हिस्सा बताया, जिससे समुदाय की विशेष स्थिति और 1990 के विस्थापन के बाद की प्रतिज्ञाओं को धुएं में बदल दिया जा रहा है।

हजारों पंडितों ने स्रीनगर के हाउसिंग कॉम्प्लेक्स‑3 के पास मार्च किया, प्रमुख मार्गों को अवरुद्ध किया और प्रशासनिक कार्यालयों के सामने जंजीरें डालीं। समूहों ने सरकार को एक विस्तृत याचिका प्रस्तुत की, जिसमें उसने 1990‑इंडिया‑पाक युद्ध के बाद शरणार्थी पंडितों को दी गई विशिष्ट राहत राशियों को पुनः वर्गीकरण करके सामान्य जनसंख्या के भोजन बीज में मिलाने के विरोध को स्पष्ट किया। याचिका में कहा गया कि इस एकीकृत नीति से पंडितों की अभावग्रस्त सामाजिक‑आर्थिक स्थितियों का समाधान नहीं होगा, बल्कि उन्हें औसत‑स्थर की सार्वजनिक सहायता के दायरे में धकेल दिया जाएगा।

केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने 6 मई 2026 को एक संक्षिप्त नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया, "सभी नागरिकों को समान खाद्य सुरक्षा प्रदान करना राज्य की प्राथमिकता है।" इसके साथ ही, मंत्रालय ने बताया कि NFSA में मौजूदा राहत राशियों का समावेश वितरण प्रणाली को सुदृढ़ और पारदर्शी बनाने हेतु आवश्यक है। इस बयान में स्थानीय पंडित समुदाय की विशिष्ट मांगों के प्रति कोई प्रायोगिक प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया की विफलता कई स्तरों पर स्पष्ट है। नीति‑निर्माण चरण में पंडित प्रतिनिधियों को उचित परामर्श नहीं दिया गया, जबकि समान्यतः सामाजिक न्याय और विशेष समूहों के अधिकारों को सुदृढ़ करने के लिए केंद्र‑राज्य स्तर पर कार्यशालाओं का आयोजन अनिवार्य होता है। इस अनदेखी से न केवल केंद्र सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठता है, बल्कि नीति‑पर्वतकंत्र की अभिकेन्द्रता पर भी प्रकाश पड़ता है।

विशेष रूप से, यह घटना संस्थागत सुस्ती का प्रतीक बन गई है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के मूल उद्देश्यों को याद करें – खाद्य सहजता, पोषण सुरक्षा और गरीबी उन्मूलन। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए विविध सामाजिक कारकों का विश्लेषण आवश्यक है, परंतु इस बार निर्णय प्रक्रियाएँ ‘एक‑सभी के लिये समान’ के नारें दोहराते हुए, वास्तविक सामाजिक असमानताओं को धुंधला करने में सफल रहीं।

नागरिक उत्तरदायित्व के संदर्भ में, पंडित आंदोलन ने यह उजागर किया कि सार्वजनिक योजनाओं में विशेष प्रवक्ता समूहों की आवाज़ को दबाने से राज्य‑समाज संबंधों में त्रुटिपूर्ण संतुलन बनता है। जब लाभ‑वितरण के तंत्र में किसी विशेष वर्ग के पूर्व‑संविधानात्मक समझौतों को नजरअंदाज़ किया जाता है, तो सामाजिक विश्वास का क्षीणन अपरिहार्य हो जाता है।

फाइलों में अब तक के संकेत दर्शाते हैं कि सरकार के पास दो विकल्प हैं: या तो पंडित समुदाय की विशिष्ट माँगों को पुनः विचार कर, राहत राशियों की अलग‑अलग निगरानी सुनिश्चित करे, या फिर मौजूदा एकीकृत प्रणाली को बिना किसी संशोधन के लागू करे। पहले विकल्प में नीति‑परिवर्तन की सम्भावना है, परन्तु इसमें वैधानिक संशोधनों, बजट पुनर्निर्धारण और जिला‑स्तर पर पुनः समन्वय की आवश्यकता पड़ेगी।

जैसे ही जम्मू‑कश्मीर सरकार ने इस मुद्दे पर आपातकालीन बैठक बुलाई, कई सामाजिक वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी कि यदि विशिष्ट लक्षित समूहों की अपेक्षाओं को अनदेखा किया गया तो ‘समानता’ शब्द का प्रयोग मात्र एक शब्दजाल बन कर रह जाएगा। यह बहस न केवल कश्मीरी पंडितों के तत्काल अधिकार की रक्षा के लिये महत्वपूर्ण है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की विस्तृत नीति‑निर्माण प्रक्रिया में जवाबदेही और समावेशिता का एक निर्णायक परीक्षण भी है।

आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रशासनिक अनिश्चितता को दूर करने हेतु क्या समय पर पुनर्मूल्यांकन होगा या फिर बहुपक्षीय संवाद के अभाव में सामाजिक तनाव और बढ़ता रहेगा।

Published: May 7, 2026