कनाडा के गुप्तचर ने भारत को विदेशी हस्तक्षेप में शामिल बताया, खालिस्तान उग्रवाद को राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम माना
कनाडाई सुरक्षा खुफिया सर्विस (CSIS) ने हाल ही में जारी किए गये एक व्यापक रिपोर्ट में भारत और चीन को विदेशी हस्तक्षेप में शामिल राष्ट्रों के सूची में सम्मिलित किया। इस दस्तावेज़ में यह कहा गया है कि दोनों देशों ने कैनाडा के binnen-राजनीतिक प्रक्रियाओं में अप्रत्यक्ष लेकिन प्रभावशाली भूमिका निभाई है।
रिपोर्ट ने भारत के ‘ऐतिहासिक गुप्त कार्यों’ को स्वीकार किया, जबकि उसी समय खालिस्तान उग्रवादियों को देश के भीतर सबसे गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे के रूप में दर्ज किया। यह वर्गीकरण उन प्रवासी समूहों पर प्रतिबिंबित होगा, जिनकी गतिविधियों को अब अवरुद्ध करने के लिये कड़े उपायों की संभावना है।
वर्तमान समय में ओटावा और नई दिल्ली के बीच संबंध सुधार के प्रयास जारी हैं, लेकिन इस नई रिपोर्ट ने पहले की कई सार्वजनिक आरोपों को कम करके प्रस्तुत किया। आधिकारिक तौर पर कहा गया है कि भारत के खिलाफ पूर्व में लगाए गए गंभीर आरोप अब “बहुत अधिक अनुमानात्मक” माने जा रहे हैं, जिससे कूटनीतिक टेढ़ी-मेढ़ी चाल का संकेत मिलता है।
भारत की प्रतिक्रिया सीमित रहे, केवल पारस्परिक संज्ञान के साथ एक ‘जोरदार बहस’ का उल्लेख किया गया। कोई स्पष्ट जवाबदेही प्रक्रिया या पारदर्शी जांच का उल्लेख नहीं किया गया, जो प्रशासनिक सुस्ती और संस्थागत जवाबदेही के अभाव को उजागर करता है। इस प्रकार की प्रतिक्रिया सरकारी नीति‑निर्माण की नज़र में निरंतर ‘का'भा' तरीकों से कार्य करने की प्रवृत्ति को रेखांकित करती है।
विदेशी मामलों में भारत की रणनीति, विशेषकर प्रवासी समुदायों के साथ जुड़ाव, अब दोधारी तलवार बन गई है। जबकि कूटनीति के माध्यम से अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने की कोशिश की जाती है, वहीं गुप्तचर संचालन के बार-बार सामने आने से अंतरराष्ट्रीय विश्वास क्षीण हो रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में, कूटनीतिक ‘चाकूबाज़ी’ की तुलना करना व्यंग्य नहीं, बल्कि वास्तविकता के करीब है।
आंतरिक रूप से, भारतीय खुफिया एजेंसियों को संसद की निगरानी और सार्वजनिक जांच के मर्यादित दायरे का सामना करना पड़ता है। विदेशी आरोपों के प्रकाश में यह स्पष्ट हो रहा है कि संस्थागत ढाँचा पर्याप्त कठोर नहीं है; प्रभावी नियंत्रण और जवाबदेही तंत्र की कमी नीतिगत विफलता को सुदृढ़ कर रही है।
इन घटनाओं का सबसे प्रत्यक्ष असर भारतीय प्रवासी समुदाय पर पड़ेगा। संभावित नज़रबंदी, सामाजिक प्रतेक्शन और अनुचित तैनाती के डर के बीच, यह समुदाय दोतरफा तनाव का बिंदु बन सकता है। साथ ही, भारत के भीतर जनमत के स्तर पर भी यह सवाल उठेगा कि सरकार कैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर रोष कम करके राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकती है, जबकि घरेलू संस्थात्मक कमजोरी स्पष्ट हो रही है।
Published: May 4, 2026