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केरल में कांग्रेस का शक्ति खेल: रविवार तक सीएम उम्मीदवार का चयन
केरल के भीतर कांग्रेस ने इस सप्ताह अपनी शक्ति सुदृढ़ करने के लिए तेज़ी से काम किया है। राज्य सभा और लोकसभा के आगामी चुनाव परिदृश्य को देखते हुए, पार्टी ने भाजपा‑लीड संयुक्त गठबंधन के संभावित प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं किया है। अब तक चार प्रमुख नेताओं को संभावित मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में माना गया था, परंतु कार्यकारी समीकरण को संतुलित करने के लिये रविवार तक अंतिम निर्णय ले लिया जाएगा।
राजनीतिक दलों के इस आंतरिक खेल से एक बात स्पष्ट होती है – भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली में नीतियों की दिशा अक्सर शक्ति की ललक के साथ बदलती रहती है, जबकि प्रशासनिक जवाबदेही अक्सर पीछे छूट जाती है। केरल के पिछले पाँच सालों का विकास मॉडल, स्वास्थ्य‑सही, शिक्षा‑सर्वोच्च पर आधारित रहा, परंतु प्रशासनिक अडचनें और नीतिगत उलझनों ने कई सार्वजनिक सेवाओं को अस्थिर कर दिया। कांग्रेस का यह नया सैन्यीकरण‑सदृश चयन प्रक्रिया, न केवल अभियानों की तत्परता को दर्शाता है, बल्कि नीति‑निर्माण में गहरी संस्थागत सुस्ती को भी उजागर करता है।
वर्तमान में केरल सरकार की कई प्रमुख नीतियों, जैसे जल संसाधन प्रबंधन, श्रमिक सुरक्षा, एवं ग्रामीण बुनियादी ढाँचा, में विभिन्न स्तरों पर कार्यान्वयन में कमी देखी जा रही है। इन कमियों को सुधारने के लिये स्पष्ट कार्य‑योजना की कमी ही प्रमुख कारण रहा है। कांग्रेस के इस समय पर नेता का चयन करके, इन समस्याओं को दिखावे के साथ हल करने का जोखिम बना रहता है, जबकि वास्तविक उत्तरदायित्व के कार्यान्वयन को स्थिरता नहीं मिल पाती।
प्रशासनिक प्रतिक्रिया के संबंध में राज्य के मुख्य सचिवालय ने अभी तक इस राजनीतिक गतिविधि पर कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की है। इस प्रकार, एक अस्थिर राजनीतिक माहौल में, सार्वजनिक प्रशासन की मौनता नीतिगत विफलताओं को और गहरा सकती है। विशेषकर केरल जैसी सामाजिक‑आर्थिक रूप से संवेदनशील राज्य में, निरंतर नीति‑परिवर्तन और नेतृत्व में बार‑बार बदलाव, सार्वजनिक सेवाओं की स्थिरता को बाधित कर सकते हैं।
नागरिक प्रभाव की दृष्टि से, इस शक्ति‑खेल का प्रत्यक्ष परिणाम चुनावी विडियो‑रिपोर्टों और सार्वजनिक सभाओं में देखा जा सकता है, जहां मतदाता अक्सर नीतियों के बजाय उम्मीदवार के व्यक्तिगत करिश्मे पर अधिक ध्यान देते हैं। यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करती है और नीति‑निर्माण को अस्थायी सतह‑स्मृति में बदल देती है।
इस स्थिति में, कांग्रेस द्वारा रविवार को घोषित किया जाने वाला मुख्यमंत्री उम्मीदवार न केवल उत्तरार्ध में आने वाले चुनावों की दिशा तय करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि केरल के प्रशासनिक तंत्र में स्थायी सुधार की गुंजाइश कितनी है। अगर चयन प्रक्रिया में स्पष्टता, प्रादेशिक प्रतिनिधित्व, और नीतिगत निरंतरता को प्राथमिकता दी गई, तो यह राजनीतिक रणनीति को प्रशासनिक उत्तरदायित्व के साथ सामंजस्य स्थापित करने का अवसर बन सकता है। अन्यथा, यह केवल सत्ता के लिये एक बार फिर का दिखावा रह जाएगा, जिसमें संस्थागत सुस्ती और सार्वजनिक सेवाओं की कमजोरी को दरकिनार किया जाएगा।
Published: May 7, 2026