केरल में कांग्रेस की भारी जीत, मुख्यमंत्री पद का फैसला अनिश्चित
केरल में 15 अप्रैल को आयोजित विधानसभा चुनावों के परिणाम 5 मई को घोषित हुए। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने गठबंधन दलों के साथ मिलकर 83 में से 68 सीटें जीतीं, जिससे यह राज्य में 30 साल बाद पहली बार काफी अंतर से सत्ता में वापस आया। पिछली अवधि में लगातार दशकों तक सत्तारूढ़ बाएँ मोर्चे (एलडीएफ) के गिरावट का आंकलन कई विश्लेषकों ने किया था, परन्तु इस जीत को निरुपयोगी ‘जॉब की गिनती’ के रूप में नहीं आँका जा सकता।
परंतु, जीत के बाद का सबसे बड़ा दुविधा यह है कि कांग्रेस के भीतर प्रमुख आकांक्षी नेताओं में से कोई स्पष्ट रूप से मुख्यमंत्री पद के लिए चयनित नहीं हुआ है। पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर व्यवस्थित रूप से संवाद की कमी देखी जा रही है। परिणामस्वरूप, गठबंधन के भीतर अनिश्चितता ने न केवल मीडिया को बल्कि आम जनसंख्या को भी उलझन में डाल दिया है।
चुनाव प्रबंधन को देखते हुए राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग ने स्तिथि को शालीनता से संभाला, सुरक्षा व्यवस्था में कोई गंभीर कमी नहीं आई और मतदान प्रक्रिया को समय पर समाप्त किया। परंतु, मतगणना के बाद राज्य प्रशासन की प्रतिक्रियात्मक गति को लेकर प्रश्न उठते हैं। कई वरिष्ठ राजपत्रिक सूत्रों ने बताया कि नई कांग्रेस सरकार के गठन में कई महीनों का विलंब संभव है, जिससे मौजूदा प्रशासनिक प्रबंधन में मौहमी रुकी हुई प्रतीत होती है।
सार्वजनिक नीति निर्माताओं की इस अनिर्णयता का सीधा असर स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी अवसंरचना को लेकर चल रही पहलों पर पड़ रहा है। पिछले पाँच साल में केरल सरकार ने ‘स्वस्थ्य केरल’ और ‘डिजिटल अभ्युदय’ जैसे महत्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू किए थे, परन्तु उनकी प्रभावशीलता अब तक आँकी नहीं जा सकी। यदि नई सरकार समय पर नहीं बन पाती, तो इन पहलों की सततता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जिससे सार्वजनिक भरोसा क्षीण हो सकता है।
नीति‑निर्माण में संस्थागत सुस्ती और पार्टी‑आधारित सर्वेक्षणों पर अत्यधिक निर्भरता ने इस स्थिति को और गंभीर बना दिया है। कांग्रेस की वरिष्ठ नेतृत्व ने अभी तक कोई पारदर्शी चयन प्रक्रिया विकसित नहीं की है, जिससे आंतरिक दलों में वैर-भेद पैदा हो रहा है। इस अनिश्चितता को देखते हुए, नागरिक अधिकार संगठनों ने प्रशासनिक जवाबदेही की माँग की है और कहा है कि ‘संबधित निर्णय बिना सार्वजनिक विमर्श के नहीं किए जा सकते’।
समग्र रूप से, कांग्रेस की उल्लेखनीय जीत के बावजूद केरल की राजनीतिक स्थिरता अभी भी प्रश्न चिह्न में घिरी है। गठबंधन की आंतरिक गतिशीलता, प्रशासनिक प्रतिक्रियात्मकता की कमी और नीतिगत दिशा‑निर्देशों की अस्पष्टता यह संकेत देती है कि सत्ता परिवर्तन के अवसर पर भी सार्वजनिक प्रबंधन में गहरा सुधार आवश्यक है। केवल स्पष्ट नेतृत्व और उत्तरदायी शासन ही केरल के विकास को निरंतरता प्रदान कर सकते हैं।
Published: May 5, 2026