केरल चुनाव 2026: पिनरायि वियाजयन का केंद्रीकृत मॉडल अब बेमानी
केरल में इस महीने जलवायु‑परिवर्तन‑प्रेरित बाढ़, स्वास्थ्य‑सेवा और शिक्षा के प्रमुख मुद्दों के परिप्रेक्ष्य में 2026 के विधानसभा चुनावों की तैयारियां तीव्र हो गई हैं। मौजूदा एलडीएफ‑शासन, जिसका प्रमुख चेहरा मुख्यमंत्री पिनरायि वियाजयन है, अपने ‘ब्रांड पिनरायि’ के तहत एक केंद्रित प्रशासनिक ढांचा पेश कर रहा है। परन्तु यह मॉडल, पिछले दो कार्यकालों में स्थापित नीतियों और योजनाओं की निरंकुश लागू‑स्थिति से अब जवाबदेह नहीं रहा।
केंद्रीकृत शासन का मूल उद्देश्य नीतियों की तेज़ी से कार्यान्वयन था; परन्तु वास्तविकता में यह कई स्तरों पर प्रशासनिक सुस्ती को बढ़ावा दे रहा है। प्रथम, स्थानीय निकायों को निर्णय‑प्रक्रिया से बाहर रखा गया है, जिससे ग्राम पंचायतों की योजना‑निर्माण शक्ति घट गई और सार्वजनिक सहभागिता सीमित रह गई। दूसरा, विभागीय समन्वय में अनावश्यक विराम आया है—जैसे कि जल‑संकट के बाद भी पुनरुद्धार कार्यों में एकीकृत प्रबंधन की कमी रही, जिससे कई इलाकों में राहत सामग्री का वितरण देर से हुआ।
वित्तीय पहलुओं को देखें तो, पिछले दो वर्षों में राज्य की ऋण‑स्तर में 20% की बढ़ोतरी हुई है, जबकि सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिये ख़र्ची के अनुपात में असमानता स्पष्ट है। इस असंतुलन की जिम्मेदारी केवल राज्य सरकार की नहीं, बल्कि केंद्र की वित्तीय सहयोगी नीतियों पर भी सवाल उठाते हैं। केंद्र‑राज्य संबंधों में असहमति का प्रभाव नीति‑निर्माण की गति पर भी पड़ा है; कई महत्वपूर्ण प्रोजेक्टों को मंजूरी मिलने में महीनों का विलंब दिखाया गया।
विपक्षी दल, विशेषकर यूडीएफ और उभरती हुई भाजपा, इस मॉडल को ‘एकाधिकार‑शासित’ के रूप में नामित कर रहे हैं। उनका तर्क है कि एक ही व्यक्ति के हाथों में निर्णय केंद्रित होने से न केवल बिचौलियों की शक्ति बढ़ती है, बल्कि उत्तरदायित्व की परतें भी मोड़ लेती हैं। कल्याण‑संकुल योजनाओं के आंकड़ों में दिखते अंतर, जैसे कि शर्त‑बिना आवास योजना में लाभार्थी अपीलों की अनुगमन में गिरावट, इस बात की पुष्टि करता है कि जवाबदेही तंत्र विफल हो रहा है।
सिविल समाज ने भी इस परिप्रेक्ष्य को उजागर किया है। विभिन्न एनजीओ और नागरिक समूहों ने नीतियों के ‘प्रभाव‑आधारित’ मूल्यांकन की मांग की है, जबकि राज्य के मौजूदा मॉनिटरिंग ढांचे में केवल प्रक्रियात्मक अनुपालन पर ही ज़ोर दिया जाता है। परिणामस्वरूप कई कल्याण‑कार्यक्रमों का वास्तविक लाभार्थी तक पहुँचना नहीं हो पाता, जिससे सार्वजनिक भरोसा घट रहा है।
उपलब्धियों की बात करना आवश्यक है—केरल ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्तर पर सराहना पाई है। परन्तु इन उपलब्धियों को स्थायी बनाने के लिये आवश्यक व्यवस्था‑सुधार, प्रबंधन संरचना का विकेंद्रीकरण और नीति‑निर्धारण में बहुपक्षीय भागीदारी अभी भी अधूरी है। यदि आगामी चुनावों में यह केंद्रीकृत मॉडल ‘भूतकाल की अति’ के रूप में ठहराया गया, तो यह न केवल एएलडीएफ के भविष्य को बल्कि पूरे राज्य के शासन‑परिवर्तन की दिशा को पुनः परिभाषित करेगा।
Published: May 5, 2026