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कानून की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट ने शुरू किया सुनावनी: सीईसी‑ईसी चयन प्रक्रिया को चुनौती
7 मई 2026 को दिल्ली के सर्वोच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण सुनवाई का आरम्भ हुआ, जिसमें सरकारी द्वारा 2024 में पारित "मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी विधेयक" की संवैधिक वैधता पर प्रश्न उठाए गये। इस विधेयक के तहत केंद्र सरकार को सीधे सीईसी तथा दो निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार प्रदान किया गया, जबकि पहले इस प्रक्रिया में बहु‑पक्षीय समिति या स्वतंत्र चयन आयोग की भागीदारी अनिवार्य थी।
मुकदमा दायर करने वाले नागरिक संगठनों, कुछ राज्य चुनाव आयोगों और पूर्व निर्वाचन आयुक्तों ने तर्क दिया कि इस परिवर्तन से निर्वाचन प्राधिकरण की स्वतंत्रता घटेगी, प्रशासनिक निरुपयोगिता को उकसाएगा और लोकतंत्र की मौलिक अवधारणा को धूमिल कर देगा। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 324‑परिशिष्ट II की विधेयक के साथ असंगतता, तथा “सतत, निष्पक्ष और स्वतंत्र” चुनाव कराने के संविधानिक दायित्व की उपेक्षा का हवाला दिया।
सरकार ने जवाब में कहा कि विधेयक का उद्देश्य नियुक्तियों में पारदर्शिता के साथ गति लाना, राजनीतिक अस्थिरता को रोकना और चुनावी प्रक्रिया को तेज़ी से अधिनियमित करना है। वहीं, इस बात पर ज़ोर दिया गया कि नियामक प्राधिकारी की स्वरूप में कोई कमी नहीं लाई गई; केवल चयन के समय‑सीमा को घटाया गया है। इस स्थिति में सरकारी बयान और न्यायिक प्रश्न दो बिंदु‑परस्पर विरोधी प्रस्तुत करते हैं – एक ओर कार्यात्मक कुशलता का दावा, तो दूसरी ओर स्वायत्तता के क्षणिक हटाव का संदेह।
न्यायिक प्रक्रिया के शुरुआती चरण में, न्यायालय ने पक्षियों की सुनवाई में दो प्रमुख मुद्दे उठाए: (i) क्या विधेयक निर्वाचन आयोग की संरचनात्मक स्वतंत्रता को संवैधानिक रूप से बाधित करता है, और (ii) क्या इस प्रकार की नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को प्रतिस्थापित कर सार्वजनिक जवाबदेही को कमजोर कर देती है। दोनों प्रश्नों के उत्तर में न्यायालय की प्रवृत्ति देखी जाएगी कि वह संस्थागत औचित्य को कैसे मापता है।
इस कानूनी टकराव के प्रशासनिक निहितार्थ स्पष्ट हैं। यदि विधेयक को बरकरार रखा गया तो भविष्य में चयन प्रक्रिया में राजनीतिक दबाव का जोखिम बढ़ेगा, जिससे चुनावों की वैधता पर नागरिक विश्वास घट सकता है। वहीं, यदि न्यायालय इसे निरस्त कर देता है तो सरकार को पुनः एक संतुलित, बहु‑पक्षीय चयन तंत्र स्थापित करना पड़ेगा, जो समय‑संकट और संसाधन‑खपत का कारण बन सकता है।
सार में, यह सुनवाई न केवल एक विधायी प्रश्न को हल करने का माध्यम है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थानों की कार्यक्षमशीलता, प्रशासनिक जवाबदेही और नीति‑निर्माण में रूढ़िवादी‑प्रगतिशील संतुलन को परखने की परीक्षा भी है। यह देखना बाकी है कि न्यायालय किस दिशा में झुकाव दिखाएगा, जिससे आगामी निर्वाचन चक्र में जनता के भरोसे और संस्थागत मजबूती दोनों पर दीर्घकालिक असर पड़ेगा।
Published: May 7, 2026