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Category: भारत

केन्द्रीय सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव मंजूर किया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अध्यक्षता में आयोजित कैबिनेट बैठक में सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन बिल, 2026 को संसद में पेश करने की स्वीकृति दी गई। यह विधेयक मौजूदा अधिनियम 1956 में परिवर्तन करके उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या को 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव रखता है।

संविधान के अनुच्छेद 124(1) में केवल मुख्य न्यायाधीश का उल्लेख है और बाकी न्यायाधीशों की संख्या तय करने की शक्ति संसद को प्रदान की गई है। इस शर्त के तहत, सरकार का यह कदम संविधान द्वारा दी गई लचीलेपन को प्रयोग में लाने के रूप में देखा जा सकता है, परन्तु यह सवाल उठता है कि पिछली दशकों में इस लचीलेपन का प्रयोग इतने कम क्यों हुआ?

न्यायिक बैकलॉग के उल्लेखनीय बढ़ाव को देखते हुए, न्यायालयीन कार्यभार के निरंतर बढ़ने को संबोधित करना आवश्यक है। हालांकि, न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की घोषणा के साथ ही यह स्पष्ट नहीं है कि नई नियुक्तियों को किस प्रक्रिया और समय‑सीमा में पूरा किया जायेगा। पिछले कई वर्षों में न्यायिक पदों की रिक्तियों को भरने में हुई देरी, प्रशासनिक सुस्ती और राजनैतिक विचारधाराओं के मिश्रण को फिर से उजागर करती है।

नीति‑निर्माण की इस पहल के पीछे दोधारी तलवार है: एक ओर, यह न्यायालय के कामकाज को तेज करने की आशा जगाती है; दूसरी ओर, यह संसद को न्यायिक व्यवस्था में अपने प्रभाव का विस्तार करने का अवसर प्रस्तुत कर सकता है। इस प्रकार की संवैधानिक संशोधन को पारदर्शी, समयबद्ध और आवश्यक जांच‑परख के बिना आगे बढ़ाना, संस्थागत जवाबदेही के सिद्धांत को कमजोर कर सकता है।

सारांशतः, न्यायाधीशों की संख्या चार तक बढ़ाने का प्रस्ताव एक तकनीकी आवश्यकता को दर्शाता है, परन्तु इसका सफल कार्यान्वयन तभी संभव होगा जब केन्द्र, विधायी निकाय और न्यायपालिका के बीच स्पष्ट समय‑सीमा, चयन मानदंड और जवाबदेही तंत्र स्थापित किया जाए। नहीं तो यह कदम केवल बैनर पर नया आंकड़ा जोड़ देगा, जबकि न्यायालयीन कार्यक्षमता की मूल समस्या, यानी केस बैकलॉग, वही बनी रहेगी।

Published: May 5, 2026