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Category: भारत

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केंद्रीय सरकार के ‘वंदे मातरम्’ आदेश पर मुस्लिम लॉ बोर्ड ने जताई दृढ़ आपत्ति

नई दिल्ली: संसाधन विभाग द्वारा 5 मई को जारी किए गए नोटिस में सभी केंद्र‑संबंधित स्कूलों व सरकारी कार्यालयों में ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य किया गया। इस कदम पर भारतीय मुस्लिम कानूनी बोर्ड (MLB) ने तत्काल अपना विरोध व्यक्त किया, यह कहते हुए कि आदेश मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है और सांविधिकता की मूल्यों के साथ असंगत है।

MLB के अध्यक्ष इरशाद अली ने 7 मई को एक आधिकारिक बयान में कहा, “‘वंदे मातरम्’ को किसी के लिए विवश करने की यह नीति भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25‑26 के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को ठेस पहुँचाएगी। यह न केवल अल्पसंख्यकों के भावनाओं का उपहास है, बल्कि नीति‑निर्माण में आवश्यक सार्वजनिक परामर्श को भी अनदेखा करता है।”

केन्द्रीय सरकार ने इस कदम को राष्ट्रीय एकता व सांस्कृतिक साक्षरता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से उठाया बताया। गृह मंत्रालय का प्रवक्ता रवीन्द्र सिंह ने कहा, “वंदे मातरम् ने स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय भावना को जन्म दिया। इसे अनिवार्य बनाना केवल एक प्रतीकात्मक कार्य नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ी में देशभक्ति का बोध कराना है।”

न्यायपालिका के पूर्वी कार्यकारी सिद्धांतों की याद दिलाते हुए, यह स्पष्ट है कि 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने भागीदारी में ‘वंदे मातरम्’ को वैकल्पिक माना था, जबकि 2006 की एक टिप्पणी में इसे ‘सांस्कृतिक धरोहर’ कहा गया। अध्यादेश के समर्थक इस दुविधा को ‘वैधानिक स्फटिक’ कहकर टालने की कोशिश कर रहे हैं, पर MLB का मानना है कि यह अनावश्यक संघर्ष को उत्पन्न करेगा।

प्रशासनिक प्रतिक्रिया में, शिक्षा विभाग ने अभी तक इस आदेश की वृत्तिक्रमिक कार्यान्वयन प्रक्रिया प्रकाशित नहीं की है। कई राज्यों ने पहले ही असुविधा और संभावित कानूनी चुनौतियों को लेकर अनिश्चितता जताई है। वहीं, शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों और शिक्षकों की प्रतिक्रिया मिश्रित है; कुछ इसे राष्ट्रीय अभिरुचि के रूप में देखते हैं, जबकि अन्य इसे बोझिल अनुशासनात्मक कदम मानते हैं।

इस घटना से स्पष्ट होता है कि नीति‑निर्माण प्रक्रिया में व्यापक सामाजिक सहभागिता की कमी है, और संस्थागत लचीलापन कमजोर पड़ रहा है। जब एक राष्ट्रीय प्रतीक को अनिवार्य करने के लिये धार्मिक अल्पसंख्यकों की संवैधानिक सुरक्षा को नजरअंदाज किया जाता है, तो प्रशासनिक सुस्ती तथा नीति‑निर्माण की असमानता का शिकार वही रहता है जो बहुमत की आवाज़ के साथ तालमेल रखता है। भविष्य में ऐसी टकरावों से बचने के लिये, सरकार को बहुपक्षीय परामर्श, विधायी स्पष्टता और न्यायिक दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करना आवश्यक होगा।

Published: May 8, 2026