जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: भारत

कांग्रेस ने सरकार की ग्रेट निकोबार योजना पर उठाए सवाल: स्थानीय आपत्ति और पर्यावरणीय चेतावनियाँ अनसुनी

नई दिल्ली, 4 मई 2026 – भारत के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने केंद्रीय सरकार के ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए। पार्टी का कहना है कि परियोजना के तहत प्रस्तावित टाउनशिप, पर्यटन इन्फ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा‑संबंधी तंत्र को स्थानीय निकोबारी समुदाय तथा पर्यावरणीय संगठनों की स्पष्ट आपत्तियों को नजरअंदाज़ कर आगे बढ़ाया जा रहा है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट, जिसे सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के दोहरा लक्ष्य मानते हुए प्रस्तुत किया है, के मुख्य घटकों में 200 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में शहर का विकास, हवाई अड्डा एवं बंदरगाह का विस्तार तथा समुद्र तटों पर उच्च‑स्तरीय पर्यटन सुविधाएँ सम्मिलित हैं। पहल का दायरा तथा बजट, दोनों ही पहले के अधिकांश पूर्व प्रस्तावों से कई गुना अधिक है।

कांग्रेस ने इस बात को उजागर करने हेतु पूर्व नौसेना प्रमुख की टिप्पणी का हवाला दिया, जिन्होंने कहा कि सुरक्षा कारणों से विकास को जोड़ना “धार्मिक” नहीं, बल्कि “नीतिगत विसंगती” है। उन्होंने तर्क दिया कि द्वीप की संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र पर बिना पर्याप्त पर्यावरणीय मूल्यांकन के बड़े‑पैमाने पर निर्माण कार्य करने का कोई औचित्य नहीं है।

परियोजना की सामाजिक जाँच में सबसे बड़ा उलटाव तब आया जब निकोबारी समुदाय ने अपना ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) वापस ले लिया। सदियों से इस द्वीप पर बसे मूल निवासी, जो अपने विशिष्ट जीव-विविधता और सांस्कृतिक विशेषताओं के लिए जाने जाते हैं, ने कहा कि प्रस्तावित विकास न केवल उनके पारम्परिक जीवन‑शैली को बाधित करेगा, बल्कि प्राकृतिक संतुलन को भी बिगाड़ेगा। इस कदम के बाद भी सरकारी एजेंसियों ने आधिकारिक तौर पर कोई नई स्पष्टीकरण या पुनः संवाद नहीं किया।

पर्यावरणीय गैर‑सरकारी संगठनों ने भी एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की, जिसमें ग्रेट निकोबार योजना के तहत संभावित समुद्री प्रवाल क्षति, वन्यजीवों के आवास विस्थापन और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में द्वीप के उच्च जोखिम का उल्लेख है। रिपोर्ट में कहा गया है कि “पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रियाओं को टाल‑मटोल करके ही इस परियोजना को आगे बढ़ाने का प्रयत्न, प्रशासनिक लापरवाही को बीमार कर रहा है।”

सरकार की प्रतिक्रिया, या तो दैनिक मतदाता संवाद के अभाव में, एक आधिकारिक टिप्पणी में “परियोजना सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के बल पर आगे बढ़ रही है” कहा गया। इस बयान में स्थानीय आपत्तियों के सार को नज़रअंदाज़ किया गया, जिससे कहा जा सकता है कि प्रशासनिक जवाबदेही के मूल सिद्धांत – सुनवाई, परामर्श और पारदर्शिता – पूरी तरह से टूटे हुए हैं।

यह घटना नीति‑निर्माण के दो प्रमुख द्वारों में ढीली पकड़ को उजागर करती है: पहला, राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर विकास को त्वरित करने के लिए आवश्यक पर्यावरणीय मूल्यांकन को टाल‑मटोल करना; दूसरा, स्थानीय समुदाय के संवैधानिक अधिकारों को अनदेखा कर बड़े‑प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाना। ऐसे निर्णय-निर्धारण से संस्थागत सुस्ती, नियामक शक्ति का दुरुपयोग और जनता के विश्वास में गिरावट स्पष्ट हो रही है।

जारी की गई NOC वापसी के बाद परियोजना के आगे के कदम अभी अनिश्चित हैं, परन्तु यह स्पष्ट है कि यदि प्रशासनिक लापरवाही और नीति‑संकट को तुरंत सुधारा नहीं गया तो ग्रेट निकोबार योजना एक बड़े सामाजिक‑पर्यावरणीय विवाद का रूप ले सकती है। इस संदर्भ में, नागरिकों और विशेषज्ञों की मांग है कि सरकार एक पुनः सुनवाई प्रक्रिया शुरू करे, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन को तीव्रता से पूरा करे और स्थानीय समुदाय की स्वीकृति के बिना कोई भी ठोस कदम न उठाए।

संक्षेप में, ग्रेट निकोबार परियोजना एक बार फिर दिखाती है कि नीति‑निर्माण में सुरक्षा व विकास के झूठे संतुलन के पीछे अक्सर जनता और प्रकृति के हितों को नजरअंदाज़ किया जाता है। ऐसी परिपाटी को बदलने के लिए न केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और संस्थागत दृढ़ता आवश्यक है।

Published: May 4, 2026