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ऑपरेशन सिन्डूर की एक सालगिरह पर कांग्रेस ने सरकार की नीतियों पर तीखा सवाल
पिछले साल मई में शुरू हुआ ऑपरेशन सिन्डूर, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान के कुछ क्षेत्रों में रणनीतिक गांठों को तोड़ना था, अब अपनी पहली वर्षगांठ पर राजनीति के कट्टर मोर्चे पर धुंधले रूप में उभरा है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस अवसर पर सरकार की रणनीति, निर्णय‑प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण पेश किया, जिससे देश‑विदेश में शासन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठे हैं।
कांग्रेस के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका ने कूटनीतिक दबाव के माध्यम से ऑपरेशन की गति को रोकने में अहम भूमिका निभाई। आधिकारिक चैनलों से प्राप्त दस्तावेज़ों से स्पष्ट है कि अमेरिकी राजनयिक प्रतिनिधियों ने क्रमशः "अनावश्यक आक्रामकता" के विरुद्ध सतर्क रहने की सलाह दी, जिससे भारतीय सेना को अपनी सीमित कार्रवाई में संकोच करना पड़ा। इस हस्तक्षेप को कांग्रेस ने "रक्षात्मक कूटनीति" के रूप में व्याख्यायित किया, जबकि यह मुद्दा मूल नीति‑निर्माण में संभावित संकोच को उजागर करता है।
सत्र की दूसरी बिंदु में कांग्रेस ने संचालन की शुरुआती अवधि में हुई भारतीय क्षति की ओर इशारा किया। अपने पारिधान में प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, तंत्रिकात्मक त्रुटियों और राजनीतिक सीमाओं के कारण कई रणनीतिक लक्ष्य अधूरे रहे। विशेषकर, सीमावर्ती इंटेलिजेंस की कमी और उच्चतम स्तर पर व्यापक रणनीतिक समन्वय की अनुपस्थिति ने शुरुआती चरणों में ही बड़ी हानि पहुंचाई। यह संकेत करता है कि सुरक्षा संस्थाओं के बीच तालमेल बनाने के लिए आवश्यक प्रोटोकॉल—जिन्हें अक्सर "परिचालन स्वतंत्रता" कहा जाता है—पर्याप्त रूप से कार्यान्वित नहीं हुए।
इसी समय, कांग्रेस ने चीन के स्पष्ट समर्थन को भी रेखांकित किया। पब्लिक डिप्लोमैसी स्रोतों में उल्लेख है कि चीन ने आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक रूप से पाकिस्तान को अतिरिक्त शक्ति प्रदान की, जिससे भारत को संभावित प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। इस समर्थन को "सहयोगी मित्रता" की श्रेणी में रखा गया है, परन्तु यह भारत के मौजूदा प्रादेशिक संतुलन को चुनौती देता है।
सारांश में, कांग्रेस ने सरकार की तीन प्रमुख विफलताओं को उजागर किया: (i) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के निर्णयों को सीमित करने वाली कूटनीतिक दबाव व्यवस्था, (ii) संचालन के शुरुआती चरण में आंतरिक तालमेल और योजना‑निरपेक्ष त्रुटियां, और (iii) चीन‑पाकिस्तान गठबंधन का लाभ उठाने में राष्ट्रीय रणनीति की कमी। इन बिंदुओं से स्पष्ट है कि नीति‑निर्माण प्रक्रिया में पर्याप्त समयबद्धता, पारदर्शी जवाबदेही और संस्थागत सशक्तिकरण की कमी है।
जबकि सरकार ने अभी तक इन आरोपों पर औपचारिक टिप्पणी नहीं दी है, प्रशासनिक उत्तरदायित्व की माँगें और भी तेज़ हो रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऑपरेशन सिन्डूर का दीर्घकालिक मूल्यांकन तभी संभव है जब सरकार इन प्रश्नों को सार्वजनिक मंच पर उठाए और उचित सुधारात्मक कदम उठाए। अन्यथा, इस प्रकार की रणनीतिक पहलें केवल कूटनीतिक उलझनों और संस्थागत सुस्ती के चक्र में फँस कर रह जाएँगी।
Published: May 7, 2026