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ऑपरेशन सिंधूर: पहले शस्त्राग्न से हिंसात्मक शांति‑आह्वान तक की उलझी कथा
भारत के गृह सुरक्षा मंत्रालय ने हाल ही में घोषित किया कि एक बहु‑पहलु वाले सैन्य अभियान, जिसका कोड‑नाम ऑपरेशन सिंधूर है, का उद्देश्य सीमित विषम क्षेत्र में हिंसा को रोकना था। इस अभियान की शुरुआत एक एकल मिसाइल प्रहार से हुई, जिसके बाद क्रमशः कई हवाई एवं भू‑स्थल प्रहार हुए, अंततः एक हितैषी पक्ष द्वारा संघर्ष विराम का आह्वान किया गया।
पहला प्रहार, सेना के आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत विकसित नई प्रक्षेप्य प्रणाली द्वारा किया गया, जिसे आधिकारिक तौर पर "विकरक 1.0" कहा गया। यह प्रहार रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण आयताकार स्थल पर था, जहाँ लंबे समय से संप्रभु‑सांप्रदायिक टकराव का इतिहास रहा है। प्रारम्भिक रिपोर्टों में कहा गया कि इस प्रहार की सटीकता 90% से अधिक थी, परन्तु वास्तविक जमीनी नुकसान का आंकड़ा असंगत रहा।
अगले दो हफ्तों में, विभिन्न वर्गीकरण‑समूहों के बीच निरंतर झड़पें दर्ज हुईं। प्रत्येक झड़प के बाद सुरक्षा मंत्रालय ने "विपरीत क्षरण को रोकने के लिये त्वरित प्रतिक्रिया" का दावा किया, जबकि रूटीन मीडिया ब्रीफिंग में कहा गया कि सभी प्रहार सीमित लक्ष्य पर ही किए गये। इस बात पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं: क्या वास्तविक लक्ष्य‑निर्धारण में वैधता थी, या यह कार्यनीति केवल आसन्न संघर्ष को स्थगित करने के लिये एक दिखावा था?
ऑपरेशन की नीति‑नीति का आधार “शुरुआती दमन, तेज़ी से समन्वय” था, परंतु कई सार्वजनिक प्रशासनिक विशेषज्ञों ने इसे प्रकरण‑समय की अनिश्चितता एवं उत्तरदायित्व‑रहितता की ओर इशारा किया। मुख्य चिंताएँ थीं:
- सुरक्षा विभाग द्वारा प्रहार के बाद रोग‑प्रवेश एवं नागरिक आश्रित क्षेत्रों पर कोई त्वरित मानवीय राहत योजना नहीं बनाई गई।
- आंतरिक सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय के अभाव से प्रहर के बाद “डेज़हीस्ट” रूपी अराजकता उभरी, जिससे नागरिकों के जीवन में बाधा उत्पन्न हुई।
- राज्य सरकारों को सूचना‑संचार की कमी के कारण संकट‑समय में त्वरित कार्य‑विधान तैयार नहीं करने पर सवाल उठे।
कई हफ्तों के बाद, विरोधी पक्ष ने एक सार्वजनिक घोषणा की जिसमें उन्होंने “संघर्ष विराम” का आह्वान किया। इस आह्वान को उचित रूप से मान्यता मिलने से पहले, केंद्रीय सरकार ने "परिस्थिति‑समीक्षा समिति" का गठन किया, जिसका कार्य प्रहर के प्रभाव, मानवीय लागत और वैधानिक दायित्वों का विश्लेषण करना था। समिति ने प्रारम्भिक रिपोर्ट में यह उजागर किया कि संचालन के दौरान कई अंतर्राष्ट्रीय मानकों की अनदेखी हुई, विशेषकर “न्यायसंगत उपयोग‑अधिकारी” (ड्युटी‑टू‑डिफेंस) सिद्धांत की।
पिछले कुछ महीनों में, राष्ट्रीय स्तर पर इस अभियान की लागत‑प्रभावशीलता, जवाबदेही और पारदर्शिता पर तीव्र बहस चल रही है। नीति‑निर्माताओं से अपेक्षा है कि वे:
- सैन्य प्रहार के बाद मानवीय सहायता के लिए स्पष्ट कार्य‑प्रोटोकॉल स्थापित करें।
- प्रत्येक प्रहार के लिये स्वतंत्र भावनात्मक परीक्षण तथा सार्वजनिक रिपोर्टिंग सुनिश्चित करें।
- सुरक्षा दलों के बीच सूचना‑साझाकरण को मजबूत करके प्रशासनिक सुस्ती को समाप्त करें।
ऑपरेशन सिंधूर से मिली सीख स्पष्ट है – केवल तकनीकी श्रेष्ठता और तेज़ी से प्रहार भरसक नहीं है; जब तक नीतिगत ढाँचे, जवाबदेही तंत्र और नागरिक‑केंद्रित दृष्टिकोण सुदृढ़ न हो, ऐसे अभियान दोहराए नहीं जा सकते। भविष्य में सरकार को इस बात का खयाल रखना होगा कि “सुरक्षा” शब्द में मानव जीवन के अधिकार को हमेशा प्रथम स्थान पर रखा जाए, न कि केवल राजनैतिक या रणनीतिक विचारों को।
Published: May 7, 2026