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ऑपरेशन सिंधूर की पहली वर्षगांठ पर पीएम मोदी ने सामाजिक मीडिया डीपी बदलने का आह्वान, प्रशासनिक ज़िम्मेदारी पर सवाल
भारत के पश्चिमी सीमा क्षेत्र में 2025 में किए गए ‘ऑपरेशन सिंधूर’ को भारतीय सैन्य ने निर्णायक सफलता के रूप में पेश किया। एक साल बाद, 7 मई 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी नागरिकों से कहा कि वे अपने सोशल‑मीडिया प्रोफ़ाइल चित्र को लाल रंग के सिंधूर में बदलें, ताकि बलों की वीरता और राष्ट्रीय दृढ़ संकल्प को सम्मानित किया जा सके। इस पहल को एक मिनट‑दर‑मिनट प्रौद्योगिकी‑संचालित सार्वजनिक जश्न के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि वास्तविक नीति‑निर्माण एवं जवाबदेही के प्रश्न अक्सर पृष्ठभूमि में धुंधले रह जाते हैं।
आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया कि इस अभियान में केवल प्रधानमंत्री के ही नहीं, बल्कि उनके मंत्रिपरिषद के सभी सदस्यों को भी भाग लेना है। पूरक रूप से, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने आधिकारिक विज्ञप्ति जारी की, जिसमें कम‑से‑कम दो सप्ताह में सभी सरकारी विभागों को अपने आधिकारिक सोशल‑मीडिया खातों पर समान रंग‑कोड (RGB #FF0000) अपनाने का निर्देश दिया गया। विदेश मंत्रालय ने इस पहल को विदेशियों के साथ संवाद में भी प्रतिबिंबित करने का उल्लेख किया, जबकि रक्षा मंत्रालय ने इसे ‘सैन्य के साथ नागरिकों की एकजुटता का प्रतीक’ कहा।
ऐसे प्रतीकात्मक कदम की सराहना करने वाले अक्सर इसे राष्ट्रीयता के पुनर्सृजन का युगोचित उदाहरण मानते हैं। परन्तु आलोचनात्मक दृष्टिकोण से देखते हुए, यह अभियान कई प्रशासनिक सीमाओं को उजागर करता है। पहली बात, इस तरह की सार्वजनिक सॉफ्ट‑पॉवर पहल को शुरू करने के लिए कोई स्पष्ट कानूनी आधार अथवा बजट आवंटन नहीं किया गया। सरकार ने उल्लेख किया है कि यह ‘स्वैच्छिक’ है, परन्तु आधिकारिक संचार में अनिवार्य स्वर का प्रयोग अक्सर कर्मचारियों को प्रवर्तन के दबाव में डालता है, जिससे अनादर या प्रतिशोध के आशंकाएँ उत्पन्न होती हैं।
दूसरी बात, ऑपरेशन सिंधूर के पश्चात सैनिकों के ठेके, पेंशन अदायगी एवं पुनर्वास योजना में कई अड़चनें अब भी बनी हुई हैं। गृह मंत्रालय के वार्षिक रिपोर्ट में यह कहा गया है कि सीमा पर पहरे वाले कर्मियों के लिए पर्याप्त चिकित्सा एवं मनो‑समर्थन सुविधाएँ अभी तक स्थापित नहीं हुईं। जबकि राजधानी में ‘सिंधूर‑डिज़ाइन’ को झूठी उपलब्धि के रूप में सजाया जा रहा है, वही समय था जब असमान वेतन, पोस्टिंग की अनिश्चितता और बुनियादी सुविधाओं की कमी को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए जा सकते थे।
नीति‑निर्माण प्रक्रिया में इस बात का भी उल्लेख होना चाहिए कि डिजिटल परिवर्तन हेतु जारी ‘डिज़ाइन‑गाइडलाइन’ किसी सार्वजनिक परामर्श या अभिप्राय चरण से गुजरा नहीं। ऐसा लगता है कि प्रशासन की प्रतिक्रिया केवल तत्काल दृश्य प्रभाव की ओर ही केंद्रित है, जबकि स्थायी सुधारों के लिये विस्तृत विश्लेषणात्मक रिपोर्ट या कार्यकारी आदेश जारी नहीं किए गए। इससे यह संकेत मिलता है कि संस्थागत जवाबदेही के मानदंडों में गिरावट आ रही है—एक ऐसी स्थिति जिसमें ‘सरकार के स्वर’ को दिखावा करने के लिए लक्षणात्मक कदम उठाए जा रहे हैं, जबकि वास्तविक कार्यस्थल में ‘सही‑सही सुधार’ नज़रअंदाज़ होते हैं।
साथ ही, इस पहल के कार्यान्वयन में डेटा सुरक्षा और निजता से जुड़े प्रश्न भी उठते हैं। सोशल‑मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर राष्ट्रीय पहचान के रूप में ‘सिंधूर‑डिपी’ को अनिवार्य करने के प्रयास से नागरिकों के व्यक्तिगत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अप्रत्यक्ष प्रतिबंध लग सकता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण है, परन्तु सरकार द्वारा वैचारिक गठबंधन को मजबूर करने के लिए ‘संवेदनशीलता’ का आह्वान करना इस संवैधानिक अधिकार के उल्लंघन की सीमा तक पहुँच सकता है।
कुल मिलाकर, ऑपरेशन सिंधूर की प्रथम वर्षगांठ पर बढ़ावा दिया गया सामाजिक‑मीडिया डीपी बदलाव अभियान, राष्ट्रीय एकता की भावना को जागृत करने के इरादे से शुरू किया गया प्रतीत होता है। परन्तु यह भी स्पष्ट है कि प्रतीकात्मक कार्यों को वास्तविक नीति‑निर्माण, वित्तीय प्रतिबद्धता और संस्थागत जवाबदेही के साथ संगत करना अभी भी भारतीय प्रशासन के सामने अनसुलझी चुनौती बनी हुई है। ऐसी प्रतीकात्मक कार्रवाई को सच्ची दृढ़ता में बदलने के लिए आवश्यक है कि सरकार न केवल ‘डिज़ाइन’ को बदलें, बल्कि सैनिकों के कल्याण, सीमावर्ती आधारभूत सुविधाओं और नागरिकों की अभिव्यक्ति स्वतंत्रता को भी समान रूप से सुदृढ़ करने का ठोस कार्यक्रम पेश करे।
Published: May 7, 2026