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Category: भारत

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ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगाँठ: भारत ने पाकिस्तान‑समर्थित आतंकवाद पर उचित जवाब दिया, लेकिन नीतिगत जाँच का अभाव रहा

7 मई, 2026 को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगाँठ मनाई। यह अभियान, जो पहलगाम में हुई घातक आतंकवादी हमले के बाद आयोजित किया गया था, पाकिस्तान‑समर्थित सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ एक निर्णायक सैन्य उत्तर माना जाता था। विदेश मंत्रालय ने इस अवसर पर कहा कि इस हमले को अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने मान्यता दी और भारत का आत्मरक्षा का अधिकार सिद्ध हुआ।

परंतु इस धूमधाम के पीछे कई प्रशासनिक प्रश्न छिपे हुए हैं। प्रथम, सुरक्षा एजेंसियों और राजनयिक विभाग के बीच समन्वय का स्तर अक्सर असंगत रहा है। जमीनी स्तर पर ऑपरेशन ने कई आतंकवादी लॉन्चपैड निरस्त किए, पर इन कार्रवाइयों की पारदर्शिता, लागत‑प्रभावशीलता और दीर्घकालिक रणनीति पर कोई सार्वजनिक अथवा संसद‑स्तरीय जांच नहीं हुई।

दूसरा, नीति‑निर्माण प्रक्रिया में संस्थागत सुस्ती स्पष्ट दिखी। आतंकवादी हमले के तुरंत बाद आपातकालीन कार्यवाही की घोषणा हुई, पर उसके बाद की समीक्षा रिपोर्टें ‘राज्य रहस्य’ की सीमा में रखी गईं। यह वही व्याख्या है, जहाँ सरकार ‘बफर ज़ोन’ बनाकर जनता के प्रश्नों को अवरुद्ध कर देती है, जबकि लोकतांत्रिक जवाबदेही का मूल सिद्धान्त ‘सूचना का अधिकार’ है।

तीसरा, प्रशासनिक उत्तरदायित्व के उपायों में कमी उजागर हुई। ऑपरेशन के बाद उत्तरी सीमांत भागों में सुरक्षा बुनियादी ढाँचा अपग्रेड करने के लिये बजट आवंटन का वादा किया गया, पर फॉलो‑अप में कई परियोजनाएँ ‘स्थगित’ या ‘अप्रगति’ के रूप में दर्ज रही। ऐसी स्थिति में सामान्य नागरिक, जो पहले से ही सीमा‑स्थलीय क्षेत्रों में रहने के कारण असुरक्षा का सामना कर रहा है, उन्हें न सिर्फ आतंकवाद के जोखिम, बल्कि प्रशासन की अकार्यक्षमता का भी द्वंद्वात्मक बोझ उठाना पड़ता है।

व्यंग्यात्मक तौर पर कहा जा सकता है कि जब सरकार ‘उचित जवाब’ की घोषणा करती है, तो अक्सर वास्तविक जवाब कहीं और छिपा रहता है – जैसे दूरस्थ पहाड़ियों में छिपा एक अनुत्तरित प्रश्न। यह अंतरिक्ष में फेंके गये बम की तरह है; शोर तो बनता है, पर प्रभावशीलता का आकलन कठिन हो जाता है।

न्यायिक और नीति‑निर्माण संस्थानों को इस बिंदु पर सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। एक स्वतंत्र, पारदर्शी जांच आयोग के गठन से ऑपरेशन की रणनीतिक सफलताओं के साथ-साथ प्रक्रियात्मक त्रुटियों को भी उजागर किया जा सकता है। साथ ही, संसद में नियमित प्रश्नकाल और समिति‑स्तरीय समीक्षाओं को सुदृढ़ कर नागरिकों को स्पष्ट उत्तर प्रदान करने की व्यवस्था करनी होगी।

अनिवार्य रूप से, भारत की ‘आत्मरक्षा का अधिकार’ का दावा तभी वैध हो सकता है, जब वह अधिकार राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ ही लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के भी साथ बरकरार रखे। ऑपरेशन सिंदूर का एक साल बाद बिंबित होना चाहिए कि न केवल आतंकवादी बुनियादी ढाँचा ध्वस्त किया गया, बल्कि संस्थागत जवाबदेही को भी सुदृढ़ किया जाए। तभी नागरिकों का भरोसा पुनःस्थापित होगा और नीतिगत असफलताओं का दोहराव रोका जा सकेगा।

Published: May 7, 2026