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एससी‑एसटी वोटरों की भागीदारी ने 2026 में बीजेपी को पश्चिम बंगाल और असम में जीत दिलाई
वर्ष 2026 के मार्च‑अप्रैल महीनों में आयोजित हुए क्रमिक राज्य चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने पश्चिम बंगाल और असम दोनों में सत्ता का दायरा बढ़ाया। सार्वजनिक आँकड़ों के अनुसार, दोनों राज्यों में अनुसूचित वर्ग (SC) एवं अनुसूचित जनजाति (ST) मतदाता कुल वोटों का लगभग 20 % से अधिक हिस्सा रखते थे, और उनके बहुल समर्थन ने पार्टी की जीत में निर्णायक भूमिका निभाई।
पश्चिम बंगाल में 294 विधानसभा सीटों में भाजपा को 122 सीटें मिलें, जबकि टृणामूल कांग्रेस दो‑तीन दशकों की छाया में 115 सीटों पर कब्जा कर पाए। असम में 126 सीटों में भाजपा ने 78 जीत हासिल की, जिससे अल्पसंख्यक-बहुल जमाने (AIUML) और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के गठबंधन को पीछे हटना पड़ा।
एससी‑एसटी वोटरों का समर्थन मुख्यतः दो कारकों से समझाया गया है: प्रथम, राज्य सरकारों द्वारा अटल पेंशन, घर‑घर में बिजली, जल-संरक्षण योजना तथा ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार जैसे कल्याणकारी वादे, जिनका लाभ सीधे इन वर्गों को मिला। द्वितीय, राजनीतिक दलों द्वारा सामाजिक न्याय के मुद्दे को सार्वजनिक मंच पर उठाना, जबकि विपक्षी दलों ने अक्सर आर्थिक विकास एवं उद्योग‑प्रधान एजेंडा पर अधिक जोर दिया।
हालाँकि, इस प्रकार की जीत के पीछे प्रशासनिक कमजोरी और नीति‑निर्माण में असंगतियों का सवाल भी उठता है। चुनाव से पहले कई राज्य सरकारों ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के कार्यान्वयन में देरी, निधि आवंटन में पारदर्शिता की कमी, तथा स्थानीय स्तर पर योजनाओं के पैरवी में असमानता को उजागर किया था। इन मुद्दों को निरस्त्र करके भाजपा ने केवल वोटर‑बेस को आकर्षित किया, न कि संरचनात्मक सुधारों को सुदृढ़ किया।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर भी सवाल उठे। दोनों राज्यों में सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की गई, परन्तु चुनाव प्रक्रिया के दौरान असमान रिपोर्टिंग, मतदाता सूची में त्रुटियाँ और पेंडिंग एफ़िडेविट की लंबी प्रक्रिया ने प्रशासनिक सुस्ती को उजागर किया। इन पहलुओं को अनदेखा कर, सत्ता में रहने वाली पार्टी का दावा है कि "विकास का दवारा सभी वर्गों के कल्याण को सुनिश्चित किया गया"। परन्तु वास्तविकता यह है कि वोटर‑भूख को जवाबदेही से दूर रखकर नीतियों को निरंतरता नहीं दी गई।
विपक्षियों ने इस बात पर बल दिया कि एससी‑एसटी ने भाजपा को केवल संख्यात्मक लाभ दिया, परन्तु दीर्घकालिक सामाजिक समानता और आर्थिक सशक्तिकरण के लिये आवश्यक बुनियादी संरचनाओं की कमी अभी भी बनी हुई है। इस संदर्भ में, नागरिक समाज ने योजना के कार्यान्वयन में निगरानी कमिटी की स्थापना का अनुरोध किया है, जिससे दावे‑पर‑विचार की जगह ठोस परिणाम सामने आएँ।
समग्र रूप में, 2026 के यह दो महत्वपूर्ण राज्य चुनाव दर्शाते हैं कि सामाजिक न्याय की पुकार पर राजनीतिक मुहर लगाकर ही वोटर‑बेस को स्थिर किया जा सकता है, परन्तु इसके साथ ही प्रशासनिक जवाबदेही, नीति‑क्रम के निरंतरता और संस्थागत सुस्ती को दूर करने के लिये ठोस कदम उठाना अनिवार्य है। यह न केवल वर्तमान सरकार की राजनीति‑कीमत को परखता है, बल्कि भारत के बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र की कार्यक्षमता की भी परीक्षा है।
Published: May 7, 2026