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Category: भारत

एईआरबी ने कुदंकुलम के 5 व 6 नंबर इकाइयों में प्रमुख उपकरण स्थापना को दी स्वीकृति

परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (एईआरबी) ने आज तमिलनाडु के कुदंकुलम न्यूक्लियर पॉवर प्लांट (केकेएनपीपी) की पाँचवीं और छठी इकाई में बड़े‑पैमाने पर उपकरणों की स्थापना को औपचारिक रूप से मंजूरी दी। यह निर्णय 6 मई 2026 को प्रकाशित हुआ, जिसके बाद राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा निगम (एनपीसीआईएल) यह कार्य तेज़ी से आरम्भ करने की तैयारी कर रहा है।

केकेएनपीपी की पहले‑चार इकाइयाँ 2013 से 2017 के बीच क्रमशः चालू हुईं, जबकि पाँचवीं और छठी इकाई 2019 में निर्माण कार्य शुरू हुए थे। हालांकि, शुरुआती शेड्यूल के मुकाबले कई सालों का विलंब हुआ, मुख्य कारणों में सुरक्षा परमिट की निरंतर प्रक्रियायी देरी, तकनीकी संशोधन और राज्य‑केंद्र के बीच समन्वयहीनता रही। एईआरबी का यह नवीनतम अनुमोदन, जो प्रमुख घटकों—जैसे प्राइमेर पम्प, टर्बाइन ब्लेड और स्ट्रेस‑बोर्ड—के फिटिंग को कवर करता है, इस देर को कम‑से‑कम कुछ हद तक डी‑क्लटर कर रहा है।

एनपीसीआईएल ने इस कदम को “क्लीन एनर्जी के लक्ष्यों का दृढ़संकल्प” कहते हुए कहा कि यह भारत की 2030 नवीकरणीय ऊर्जा प्रतिबद्धता को पूरा करने में मदद करेगा। वहीं केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने कहा कि नियामक की समय पर स्वीकृति “परमाणु सुरक्षा मानकों में कोई समझौता नहीं” करती। लेकिन इन घोषणाओं के बावजूद, प्रशासकीय जड़ता पर गंभीर प्रश्न उठते हैं। एईआरबी, जो 2000 में स्थापित एक स्वतंत्र नियामक इकाई है, अक्सर अपने स्टाफ की कमियों और तकनीकी बुनियादी ढांचे की अधूरी स्थिति को लेकर आलोचना के शिकार रहा है। इस बार भी कई रिपोर्टें बताती हैं कि उपकरण के विस्तृत सुरक्षा मूल्यांकन में कई राउंड की रिपोर्टों के बाद ही ‘साफ़ सिग्नल’ मिला।

नियामक के इस निर्णय को स्थानीय जनता की आशंकाओं के सन्दर्भ में भी देखना आवश्यक है। कुदंकुलम के पास स्थित कई गाँवों में जलवायु‑सुरक्षा को लेकर गहरी फिक्र है; पिछले दशकों में ज्वालामुखीय संरचनाओं के निकट स्थित होने के कारण, जलप्रदूषण और रेडियो‑जनित जोखिम को लेकर स्थानीय आत्मीय समूहों ने कई बार विरोध प्रदर्शन किया है। सरकार ने सार्वजनिक सुनवाई और ‘सुरक्षित कार्य’ के आश्वासन को दोहराते हुए कहा कि सभी अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा मानकों का पालन किया जाएगा, परन्तु इस बात पर भरोसा तब तक नहीं बन सकता जब तक पारदर्शी पर्यावरण‑प्रभाव आकलन की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होती।

नीति‑निर्माताओं को अब यह सवाल का सामना करना पड़ेगा कि नियामक प्रक्रिया को तेज़ करने के साथ‑साथ किस तरह भरोसेमंद एवं जवाबदेह ढांचा स्थापित किया जाए। कई विशेषज्ञों का मानना है कि एईआरबी को स्वतंत्र सौंपे गए बजट में वृद्धि, तकनीकी विशेषज्ञता हेतु बाहरी सहयोग, और निर्णय‑लेखन में समय‑सीमाओं का स्पष्ट निर्धारण आवश्यक है। इन सुधारों के बिना, भविष्य में भी बड़े‑पैमाने के परमाणु प्रोजेक्ट्स में समान देरी और सार्वजनिक अविश्वास जारी रह सकता है।

अंततः, एईआरबी की यह स्वीकृति कुदंकुलम के विस्तार के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है, पर यह भी दर्शाती है कि भारत के परमाणु ऊर्जा ढाँचे में नियामक लचीलापन और प्रशासनिक त्वरितता दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना अभी भी एक चुनौती बनकर बाकी है।

Published: May 6, 2026