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उत्तराखंड के मुख्यमंत्री धामी ने कहा: सोमनाथ भारत की शाश्वत सांस्कृतिक धरोहर
गुजरात के सोमनाथ मंदिर को 7 मई 2026 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने "भारत की शाश्वत संस्कृति, आस्था और अडिग लड़ाकू भावना का प्रतीक" कहा। यह टिप्पणी एक आध्यात्मिक सम्मिलन के दौरान की गई, जिसमें विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। धामी का यह बयान, जहाँ राष्ट्रीय एकता की भावना को उजागर करता है, वहीं वह शासन‑परिप्रेक्ष्य में कई प्रश्न भी उठाता है।
सबसे पहले, धरोहर संरक्षण की जिम्मेदारी मुख्य रूप से केन्द्र‑राज्य स्तर पर बाँटी जाती है। पर्यटक मंत्रालय ने पिछले दो वर्षों में सोमनाथ परिसर में बुनियादी ढाँचे के सुधार हेतु ₹३५० करोड़ आवंटित किए थे, लेकिन कई परियोजनाएँ अभी भी कागज़ी कार्य‑प्रक्रिया में फँसी हुई हैं। इस दौरान राज्य‑स्तर की सहभागिता सीमित रही, जिससे स्थल‑स्थानीय प्रशासन को पर्याप्त तकनीकी एवं वित्तीय सहयोग नहीं मिला।
धारी‑धाम, पर्यावरणीय संतुलन और बुनियादी सुविधाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की नीति में स्पष्ट अंतराल देखा गया। उदाहरण के तौर पर, वार्षिक तीर्थारोहियों की संख्या में 20% की वृद्धि के बावजूद, जल आपूर्ति और सफाई व्यवस्था में सुधार के लिए कोई ठोस कार्य‑योजना नहीं बनाई गई। परिणामस्वरूप, स्थानीय निकायों को अल्पकालिक दवाब सामना करना पड़ता है, जबकि दीर्घकालिक समाधान के लिए संस्थागत लज्जा स्पष्ट होती है।
प्रशासनिक आलोचना अक्सर कागज़ी प्रक्रिया में फँसे रह जाने की ओर इशारा करती है। “कभी‑कभी योजनाएँ तो ऐसे ही पेपर पर रह जाती हैं”, यह शीघ्र टिप्पणी इस बात को दर्शाती है कि योजना‑निर्माण और कार्यान्वयन के बीच की खाई बहुत बड़ी है। इस खाई को पाटने के लिये केन्द्र और राज्य के बीच संयुक्त समन्वय समिति की सिफारिशें अभी तक लागू नहीं हुईं।
नागरिक प्रभाव के संदर्भ में, सोमनाथ का पर्यटन आय स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिये महत्वपूर्ण है। परन्तु, यदि प्रशासनिक अकार्यक्षमता बनी रहती है तो रोजगार उत्पन्न करने वाले छोटे उद्यम—जैसे होटल, भोजनालय और शिल्पकार—पर प्रतिकूल असर पड़ सकेगा। इसके अलावा, धरोहर के असुरक्षित होने से सांस्कृतिक पहचान का ह्रास भी संभव है, जो राष्ट्रीय एकता के सैद्धांतिक आधार को कमजोर कर सकता है।
समग्र रूप से, धामी का सोमनाथ को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में मान्य करना सामाजिक भावनाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में सराहनीय है, पर यह प्रशंसा तभी सार्थक बनेगी जब नीति‑निर्माताओं द्वारा स्पष्ट, समयबद्ध और पारदर्शी कार्य‑योजना तैयार कर, संस्थागत सुस्ती को तोड़ते हुए सार्वजनिक लाभ को प्राथमिकता दी जाए।
Published: May 7, 2026