इराक-ईरान के निशाने पर यूएई के फुजैरा में हमला: 3 भारतीय घायल, मोदी ने कहा "नागरिक एवं बुनियादी ढाँचा लक्ष्य बनाना अस्वीकार्य"
बुधवार, 5 मई 2026 को यूएई के फुजैरा प्रांत में इरान-समर्थित मिलिशिया द्वारा किया गया हवाई हमला तीन भारतीय नागरिकों को घायल कर गया। स्थानीय स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, दो युवा पेशेवर और एक छात्र को हल्की से मध्यम चोटें आईं। यह घटना अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के केंद्र में स्थित फुजैरा के एक औद्योगिक जंक्शन में हुई, जहाँ सामान्यत: निर्यात‑आयात के बड़े‑पैमाने पर संचालन चलता है।
इसी दिन शाम को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हमले की निंदा की, यह स्पष्ट करते हुए कि "नागरिक एवं बुनियादी ढाँचा को लक्ष्य बनाना अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन के बराबर है"। उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने तुरंत दुबई के दूतावास, अमेरिकी दूतावास तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के माध्यम से इस घटना को लेकर कूटनीतिक प्रोटोकॉल शुरू कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने इराक के साथ भी द्विपक्षीय संवाद का आह्वान किया, जिससे इस प्रकार के निंदनीय कार्यों को रोकने के लिए स्पष्ट जवाबदेही स्थापित की जा सके।
परंतु इस तीव्र प्रतिक्रिया के बावजूद, कुछ बारम्बार बुरे लक्षण सामने आ रहे हैं। पिछले कई वर्षों में भारतीय विदेश मंत्रालय की संकट‑प्रबंधन प्रणाली में समयबद्ध सूचना प्रवाह और सतत जोखिम‑मूल्यांकन में कमी दर्ज की गई है। फुजैरा के हमले से पहले भी भारत के नागरिकों को मध्य‑पूर्व में अलग‑अलग सुरक्षा जोखिमों से बचाने के लिए एकीकृत मंच की कमी थी, जिसके कारण कई बार स्थानीय सुरक्षा निकायों के साथ समन्वय में देरी हुई। इस संदर्भ में, विदेश मंत्रालय के ब्रीफ़िंग में अक्सर "डेटा की गति" को लेकर धीरज की कमी स्पष्ट हो जाती है—एक विडंबनात्मक तथ्य कि जब नागरिकों को खतरे में डालने वाली गतिशीलता को ट्रैक नहीं किया जाता, तो सरकारी प्रतिक्रिया भी धीमी पड़ती है।
नीति‑निर्माण की बात करें तो, भारतीय सरकार ने हाल ही में मध्य‑पूर्व में अपनी रणनीतिक सहभागिता को दोबारा परिभाषित करने की घोषणा की है, परन्तु इसके कार्यान्वयन में स्पष्ट रूपरेखा नहीं दिखाई देती। त्रैस्थानीय सुरक्षा समझौते, गुप्त निगरानी, तथा समुद्री बलों की त्वरित तैनाती को लेकर वर्तमान में कोई ठोस प्रोटोकॉल नहीं है। ऐसी असमान्य स्थिति न केवल भारतीय हितों को जोखिम में डालती है, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता और विश्वसनीयता को भी धूमिल करती है।
उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि इरान-समर्थित हमले ने न केवल तीन भारतीय नागरिकों को शारीरिक चोटें पहुँचाई, बल्कि भारत की विदेश नीति में मौजुदा संरचनात्मक खामी को भी उजागर किया। सरकार की तत्काल कूटनीतिक कदम सराहनीय हैं, परन्तु दीर्घकालिक समाधान के बिना यह केवल क्षणिक शिंकार रहेगा। इस दिशा में प्रशासन को चाहिए कि वह जोखिम‑आधारित सुरक्षा मॉडल अपनाए, त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र को सुदृढ़ करे, और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज़ को सुस्पष्ट एवं निरंतर बनाये रखे—ताकि भविष्य में किसी भी नागरिक को बिन बुलाए ग़ैर‑रहस्यपूर्ण लक्ष्य बनना न पड़े।
Published: May 5, 2026