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Category: भारत

इंडस जल समझौते में नई चुनौतियाँ: बाधाएँ, शोषण और लंबित जवाबदेही

इंडस जल समझौता, 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित, दो दशकों से अधिक समय से दक्षिण एशिया की जल सुरक्षा की रीढ़ रहा है। फिर भी, इस समझौते की वैधता आज एक गंभीर प्रश्नावली बन गई है, जहाँ दोनों पक्षों की नीतिगत असफलताएँ और प्रशासनिक सुस्ती स्पष्ट तौर पर उभर रही हैं।

पिछले साल, पाकिस्तान ने पश्चिमी नदी प्रणाली (जम्मू, चेन्नी) में एक नई बाढ़ नियंत्रण परियोजना—‘रॉयल जलाशय’—की शुरूआत की, जिससे भारत के लिए उपलब्ध जल मात्र में संभावित कमी का जोखिम पैदा हो गया। भारत ने तुरंत अपना आपत्ति पत्र भारत-विदेश मंत्रालय को भेजा, परन्तु इस पर प्रतिक्रिया मिलने में महीनों का विलंब रहा। इस देरी को अक्सर ‘संस्थागत सुस्ती’ और ‘राजनीतिक गड़बड़ी’ कहा जाता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के अंतर्गत विशेषीकृत टीमों की कमी और अंतरराष्ट्रीय जल आयोग (IAWC) के साथ संवाद में व्यवस्थित अकार्यक्षमता रही है।

इसी प्रकार, भारत ने भी अपने कुछ जल-परियोजनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ाया है, जैसे कि हेरन दक्षिणी जलभरण परियोजना, जिसका उद्देश्य मुलायम जलकोयला से अधिक मात्रा में पानी पकड़ना है। पाकिस्तान ने इसे ‘समझौते का उल्लंघन’ कहकर बुलाया, परन्तु घरेलू स्तर पर इस परियोजना की लागत‑लाभ विश्लेषण, पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन और जनसंपर्क के अभाव को लेकर सार्वजनिक बहसें उभरी हैं। नीतिनिर्माताओं की अनिच्छा ने न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाला, बल्कि किसानों, जल-आधारित उद्योगों और जल-आश्रित समुदायों के जीवन-स्तर को भी अस्थिर किया।

समझौते की निगरानी संस्था—इंडस वाटर ट्रीटी ऑथोरिटी (IWTA)—के अभिकर्ता भी इस बेला में निष्क्रिय दिखे। 2025 में किए गए वार्षिक मीटिंग में, दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने कई तकनीकी मुद्दों को उजागर किया, परन्तु कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई। बार‑बार की गई ‘विश्वास‑बिल्डिंग कार्यशालाएँ’ अब एक शब्दजाल तथा कागज़ी औपचारिकता बन गई हैं, जबकि वास्तविक जल प्रवाह के आंकड़े अनियमित रूप से बदलते रहे।

इस अधूरा उत्तरदायित्व को लेकर भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल एक सार्वजनिक हित याचिका (PIL) के तहत संकल्पित किया कि जल संसाधन मंत्रालय को ‘जल-अभियान का त्वरित ऑडिट’ बनाना होगा। अदालत ने 60 दिनों की समय सीमा दी, परन्तु मंत्रालय ने अभी तक कोई विस्तृत रिपोर्ट नहीं भेजी। न्यायिक अभिरुचि के बावजूद, प्रशासनिक कागजों में फँसे अधिकारियों ने इस समस्या को ‘राजनीतिक संवेदनशीलता’ के कारण टाल दिया, जिससे न्यायिक आदेश की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठे।

वास्तव में, इस संकट का मूल कारण नीति‑निर्माण में दीर्घकालिक दृष्‍टिकोण की कमी और सतत निगरानी तंत्र की अनुपस्थिति है। जल‑सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ जोड़ना होना चाहिए, परन्तु वर्तमान में यह बात केवल शब्दावली में ही रह गई है। सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी, बजटीय असमानता, और अंतर-राज्य जल प्रबंधन में पारदर्शिता की अनुपस्थिति ने इन समस्याओं को और गहरा किया है।

नागरिकों को इन शक्ति-प्रयोगों के नतीजों का सामना करना पड़ रहा है: पंजाब के छोटे किसान जल अभाव के कारण फसल जलाने को मजबूर हो रहे हैं; सिंधु घाटी के मछुआरे अज्ञात जलस्तर गिरावट के कारण मछली पकड़ने में असमर्थ हो रहे हैं; और जल‑आधारित उद्योगों के उत्पादन में कमी के कारण नौकरियों का नुकसान हो रहा है। शासन की इन विफलताओं से न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि सामाजिक उत्थान की दिशा में बड़े पैमाने पर रुकावटें भी आती हैं।

इन परिस्थितियों को देखते हुए, नीति‑निर्माताओं को तुरंत दो‑तरफा संवाद मंच की पुनर्स्थापना, जल‑डेटा का स्वतंत्र रूप से संग्रहण, IWTA को सशक्त बनाना और अंतर्राष्ट्रीय जल‑विवाद समाधान तंत्र में भारत की सक्रिय भागीदारी को प्राथमिकता देनी चाहिए। अन्यथा, इंडस जल समझौते की मूल भावना—शांतिपूर्ण सहयोग और जल‑सुरक्षा—भविष्य की पीढ़ियों के लिए केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ ही रह जाएगी।

Published: May 6, 2026