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आयुष्मान भारत की धोखाधड़ी पर एआई का सख़्त प्रहार, प्रशासनिक चुप्पी का सवाल
वित्तीय वर्ष 2025‑26 में शुरू होने वाले नए एआई‑आधारित मॉड्यूल के अंतर्गत केंद्र सरकार ने आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना में धोखाधड़ी को रोकने के लिए उन्नत मशीन‑लर्निंग सिस्टम तैनात किए हैं। ये सिस्टम अस्पताल द्वारा प्रस्तुत बिलों, प्रयोगशाला रिपोर्टों और अन्य चिकित्सकीय दस्तावेज़ों की डिजिटल फिंगरप्रिंट बनाकर असली‑नकली को अंतरित कर सकते हैं। मंत्रालय का दावा है कि इससे दावा निपटान की औसत समय‑सीमा 12 से 4 दिनों तक घटेगी तथा पारदर्शिता में उल्लेखनीय सुधार होगा।
ऐतिहासिक रूप से आयुष्मान भारत में फर्जी बिलों और निर्मित दस्तावेज़ों की समस्या गंभीर रही है। प्रतिवेदन के अनुसार, 2022‑23 में ही लगभग 3.5 % कुल उपचार लागत अनधिकृत दावों के कारण पुनःविचार के दायरे में आई थी। इस पर कई बार संसद और सार्वजनिक मंचों पर सवाल उठाए गये, परन्तु प्रभावी तंत्र की कमी ने केवल सतही सुधारों को जन्म दिया। अब एआई का प्रयोग, जबकि तकनीकी रूप से प्रशंसनीय है, नीति‑निर्माताओं द्वारा पिछले पाँच वर्षों के अनियंत्रित प्रबंधन का समाधान नहीं है।
यह उल्लेखनीय है कि भारत ने इस पहल के माध्यम से ग्लोबल साउथ में स्वास्थ्य‑एआई बेंचमार्किंग प्लेटफ़ॉर्म का शीर्ष स्थान हासिल किया है। किंतु शीर्ष‑स्थान की प्राप्ति का अर्थ यह नहीं कि भीतर की बुनियादी संस्थागत कमज़ोरियाँ स्वतः मिट जाएँगी। पहली बार, इस प्लेटफ़ॉर्म के संचालन के लिए लागू डेटा‑गवर्नेंस फ्रेमवर्क अभी तक राज्य स्तर के स्वास्थ्य विभागों के साथ पूरी तरह समन्वित नहीं हुआ है, जिससे डेटा की सटीकता और गोपनीयता पर प्रश्न अंकित होते हैं।
नीति‑निर्माण की गति को देखते हुए यह स्पष्ट है कि तकनीकी समाधान को ‘जादू की छड़ी’ समझ कर प्रशासनिक सुस्ती को पाटने की आशा करना एक जोखिमपूर्ण रणनीति है। कई विशेषज्ञों ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि एआई‑टूल की प्रभावशीलता उन बुनियादी प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है, जिनमें निवारक निरीक्षण, समय‑समय पर ऑडिट और लाभार्थियों के अधिकारों की रक्षा के स्पष्ट मैकेनिज़्म शामिल हैं। इन घटकों की निरंतर उपेक्षा, चाहे वह बजट आवंटन में कमी हो या कर्मी प्रशिक्षण में टालमटोल, तब भी एआई को ‘आदर्श समाधान’ नहीं बना पाएगी।
आख़िरकार, जब केंद्र ने इस तकनीक को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की घोषणा की, तो वह वित्तीय वर्ष के अंत में ही आयुष्मान सम्बन्धी कई अनसुलझे मुद्दों—जैसे कि राज्य‑स्तर पर लाभार्थियों की पहचान‑पत्रिका की असमानता, निजी अस्पतालों के साथ अनुबंध‑भंग और अनुचित भुगतान प्रावधान—पर भी स्पष्ट दिशा‑निर्देश नहीं दे सका। इस प्रकार, एआई टूल्स का परिचय एक ‘सजावटी’ कदम बनकर रह सकता है, जब तक कि विस्तृत नीति‑फ़्रेमवर्क, जवाबदेह निरीक्षण इकाइयाँ और सार्वजनिक सहभागिता को सक्रिय नहीं किया जाता।
संक्षेप में, आयुष्मान भारत में फर्जी बिलों को रोकने हेतु एआई का प्रयोग तकनीकी दृष्टि से प्रशंसनीय है, परंतु यह स्थापित प्रशासनिक अभ्यस्तताओं, संस्थागत चक्रव्यूह और जवाबदेही की कमी को दूर करने में पर्याप्त नहीं है। नीति निर्माताओं को चाहिए कि वे इस तकनीक को विशेषज्ञ‑आधारित ऑडिट, सतत प्रशिक्षण और नागरिक‑सुलभ grievance redressal प्रणाली के साथ जोड़ें, तभी प्रणाली की वास्तविक लाभ वह होगा जो संसद और जनता निस्संदेह अपेक्षा रखती है।
Published: May 9, 2026