असम विधानसभा चुनाव में बहुमत जीतने के बाद शासन की जवाबदेही पर सवाल उठते हैं
असम के विधानसभा चुनाव के परिणामों ने पुनः राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया है। प्रमुख राजनीतिक नेता, जिन्हें स्थानीय स्तर पर अक्सर "मामा" कहा जाता है, ने अपने पक्ष को एक स्पष्ट बहुमत दिला कर सत्ता की कुर्सी सुरक्षित कर ली। हालांकि, यह जीत सिर्फ संख्या में ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्रदर्शन, नीति‑निर्माण और सार्वजनिक भरोसे के संदर्भ में गहरी जाँच को आमंत्रित करती है।
बहुमत जीतने के बाद सरकार को कई मौजूदा चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। पिछली अवधि में जलवायु अस्थिरता, बुनियादी ढाँचे की कमजोरी और रोजगार के अवसरों की कमी से नागरिकों की असंतुष्टि स्पष्ट थी। इन मुद्दों पर नीरस प्रशासनिक प्रतिक्रियाओं ने संस्थागत सुस्ती को और तेज किया, जिससे जनता के बीच निराशा की लहर तेज हुई।
राज्य सरकार ने कई विकास योजनाओं की घोषणा की थी, पर कार्यान्वयन में निरंतर देरी ने नीति‑निर्माण की प्रभावशीलता को कम कर दिया। उदाहरण के तौर पर, ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क निर्माण की वादे के बावजूद कई स्थानों पर अभी भी कच्ची सड़कें देखी गईं। ऐसी स्थिति में बहुमत की आश्वासन‑भरी जीत को वास्तविक सुधार की दिशा में बदले बिना, सत्ता के दायरे में केवल निरंकुश सत्ता‑संकलन की अफ़वा बन सकती है।
नए शासक के तहत सार्वजनिक जवाबदेही को सुदृढ़ करना आवश्यक है। प्रशासनिक निकायों को न केवल योजना बनानी चाहिए, बल्कि उनकी निगरानी‑प्रक्रिया को भी तेज़ी से लागू करना चाहिए। मौजूदा संस्थागत ढाँचा अक्सर सुबूत‑आधारित निर्णय‑लेने में असफल रहा है; इस त्रुटि को दोहराने पर राज्य की विकास गति और नागरिकों का विश्वास दोनों खतरे में पड़ सकते हैं।
आगे देखते हुए, सरकार को नीति‑निर्माण में पारदर्शिता, बुनियादी सेवाओं के त्वरित सुधार और रोजगार सृजन के ठोस उपायों को प्राथमिकता देनी होगी। केवल बहुमत का दावा ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उस बहुमत को सामाजिक न्याय, आर्थिक समावेशन और प्रशासनिक सुधर के माध्यम से वास्तविक सरकार में परिवर्तित करना ही लोकतंत्र की असली कसौटी है।
Published: May 5, 2026