असम विधानसभा चुनाव 2026: भाजपा के हिमंत बिस्वा सरमा बनाम कांग्रेस के गौरव गोइकी, प्रमुख उम्मीदवारों की जाँच
असम में 4 मई को होने वाले विधानसभा चुनाव में दो बड़े राष्ट्रीय दलों के नेता सीधा‑सामना करेंगे – वर्तमान मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रमुख अभ्यर्थी हिमंत बिस्वा सरमा, तथा कांग्रेस के सांसद गौरव गोइकी। दोनों के बीच केवल वैधता का प्रश्न नहीं, बल्कि राज्य में चल रही नीतियों, प्रशासनिक ढांचे और सार्वजनिक सेवाओं की वास्तविक स्थिति पर भी गहन चर्चा होगी।
सरमा, जिन्होंने 2021 में सत्ता हासिल करने के बाद कई केंद्र‑राज्य योजनाओं को तेज़ी से लागू करने का दावा किया, अब अपने प्रदर्शन को ‘विकास एंगेजमेंट’ के रूप में पेश कर रहे हैं। उनके प्रमुख प्रोजेक्ट्स में नमकीन जल प्रबंधन, अस्पतालों का आधुनिकीकरण और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम शामिल हैं। परन्तु संस्करणीय आँकड़ों के अनुसार, प्रोजेक्ट पूर्णता में 30 % की देरी और कई ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य‑सेवा की पहुंच अभी भी किफ़ायती स्तर से नीचे है।
वहीं गांधीवादी गुट में गोइकी ने मुख्य रूप से औद्योगिक रोजगार, बाढ़‑प्रबंधन की अक्षमता और पूर्ववर्ती सरकार की ‘नागरिक अधिकारों के उल्लंघन’ के मुद्दे उठाए हैं। उनका संदेश स्पष्ट है: ‘विकास के बजाए रोजगार सृजन पर ध्यान दे, तथा केंद्र की नीतियों को राज्य‑स्तर पर अनुकूलित करे’। हालांकि, कांग्रेस ने अभी तक ठोस वैकल्पिक योजना के रूप में किसी व्यापक बजट या कार्य‑सारणी का सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं किया है, जिससे राजनीतिक उत्तरदायित्व के प्रश्न उठते हैं।
आगामी चुनाव में कई शैडो‑उम्मीदवारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। डाक्टर रजत मेहता (बाजपा) और सामाजिक कार्यकर्ता लता दास (कांग्रेस) जैसे नाम स्थानीय स्तर पर विशेष रूप से दलित, आदिवासी और काँचरा जनसंख्या के बीच लोकप्रिय हैं। उनका प्रमुख मुद्दा बेघरता, शैक्षिक पहुंच और जल‑संकट समाधान है – जो असम की भू‑राजनीतिक चुनौतियों के मूल में खड़ा है।
निर्वाचन प्रक्रिया को नियामक ढांचे की जाँच के बिना नहीं देखा जा सकता। असम चुनाव आयोग ने विशेष सुरक्षा उपायों की घोषणा की है, परन्तु पिछले चुनावों में चुनाव‑भ्रष्टाचार की कई शिकायतें (जैसे ‘डेटा‑ट्रांसफर में अनियमितता’ और ‘पोलिंग स्टाफ के प्रशिक्षण की कमी’) ने प्रशासनिक जाँच को उजागर किया है। इस वर्ष भी, मतदाता सूची के अद्यतन में कई ग्रामों में दोगुनी प्रविष्टियाँ पाई गईं, जिससे जिला स्तर पर ‘सूचना‑प्रबंधन की सुस्ती’ का संकेत मिलता है।
व्यवस्थापक रूप में, राज्य सरकार की नीति‑निर्माण प्रक्रिया में भी निरालापन स्पष्ट है। कई बड़े बुनियादी ढाँचे के प्रोजेक्ट्स के लिये ‘एकीकृत नियोजन समिति’ की रिपोर्टें वर्षों तक अनसुनी रह रही हैं, जिससे कवायद में ‘समय‑बाधित कार्यान्वयन’ के बजाय ‘कागज़ी औपचारिकता’ को प्राथमिकता मिली प्रतीत होती है। ऐसी संस्थागत सुस्ती ही अक्सर नागरिकों को निराश करती है और शासकीय भरोसे को कमज़ोर बनाती है।
अंततः, असम के मतदाता इस चुनाव में केवल दो प्रमुख व्यक्तियों के बीच चयन नहीं कर रहे हैं; वे शासन की दिशा, नीतियों की प्रभावशीलता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व की परीक्षा ले रहे हैं। चाहे वह जल‑प्रबंध, स्वास्थ्य‑सेवा, या सामाजिक न्याय हो, आगामी मतदान यह तय करेगा कि राजनीतिक वादे वास्तविक कार्यान्वयन में कब तक बदलेंगे।
Published: May 3, 2026