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Category: भारत

असम में बीजेपी ने पहली बार अकेले बहुमत जिता, त्रयी जीत के बाद नई राजनीतिक गतिशीलता

असम के विधानसभा चुनावों ने फिर एक बार राष्ट्रीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जटिल तंत्र को उजागर किया। राष्ट्रीय जनसंघ (एनडीए) ने तीसरी लगातार जीत के साथ अपनी छवि को सुदृढ़ किया, पर असली आश्चर्य यह था कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस बार अकेले ही बहुमत हासिल किया, जो राज्य की राजनीति में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर माना गया।

फाइल में दिखाया गया आंकड़ा साफ़ है: नई सीमांकन (डिलिमिटेशन) रिपोर्ट और अभूतपूर्व मतदान सहभागिता के साथ गठबंधन ने कुल 102 सीटें जशीं। इस जीत का मुख़्य कारण दो बिंदुओं को संक्षेप में कहा जा सकता है – प्रथम, सीमा पुनर्गठन ने कई संवेदनशील क्षेत्रों को नई जनसंख्या प्रोफ़ाइल के अनुसार वर्गीकृत किया, जिससे भाजपा के पारंपरिक वोट‑बेस को फ़ायदा हुआ; द्वितीय, मतदाता टर्नआउट ने इस मतदारी में ‘सही’ मुद्दे उठाए – जल, सड़क, स्वास्थ्य – पर फोकस किया, और इस बात पर बल दिया गया कि राज्य सरकार ने इन क्षेत्रों में पिछले कार्यों को नज़रअंदाज़ नहीं किया।

हालाँकि, इस परिणाम के पीछे की प्रशासनिक तर्कशक्ति को उजागर करना आवश्यक है। पंचग्यारह जनवरी को जारी करने वाला सीमांकन आयोग, अपनी काम का विस्तार 2024 में शुरू करके, कई जिलों की सीमाओं को दोबारा खींचा। आलोचकों ने गहराई से सवाल उठाए कि यह पुनर्गठन प्रक्रिया इतनी तेज़ी से हुई कि विरोधी पार्टियों के पास नई सटीक आधारिक डेटा तैयार करने का पर्याप्त समय नहीं मिला। इस प्रकार की ‘तीव्र’ पुनर्संरचना, जबकि तकनीकी रूप से वैध, इस बात का संकेत देती है कि प्रक्रिया में पारदर्शिता के मानक ढीले पड़े थे।

इस निर्वाचन के दौरान चुनाव आयोग ने भी अपना रोल ठीक से निभाया – इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन्स (ईवीएम) के अद्यतन सॉफ़्टवेयर, मतदाता साक्षरता अभियान, और 84.3% की रिकॉर्ड भागीदारी का आंकड़ा इस बात का प्रमाण है। फिर भी, उथल-पुथल भरे माहौल में यह कहना भी उचित है कि हाई‑टेक निगरानी के बावजूद स्थानीय स्तर पर मतदाता सूचनाओं की अस्पष्टता बनी रही, जिससे मतदान के पहले दिन कई क्षेत्रों में ‘वोटिंग वैरिएशन’ की बाधा बनी रही।

वर्तमान जीत के बाद प्रशासन की प्रतिक्रिया तेज़ी से नीतियों के पुनरावलोकन में बदल गई है। मुख्यमंत्री ने जीत के बाद एक औपचारिक घोषणा में कहा कि अब सरकार ‘विकास की गति को दो गुना करेगी’, पर इस प्रकार के वादे अक्सर ‘निमंत्रण पत्र’ बनकर दिखते हैं। पिछले पाँच सालों में असम की औद्योगिक निवेश दर राष्ट्रीय औसत से 12% कम रही, जिससे यह सवाल उठता है कि ‘विकास’ शब्द को लेकर सरकार ने किस हद तक ठोस कदम उठाए हैं।

निवेशक एवं नीति-निर्माताओं के बीच यह भी कहना आम है कि ‘बजट में अतिशयोक्ति’ और ‘रोज़गार के वादे’ केवल चुनावी रियलोशनशिप का हिस्सा रहे हैं। असम में बेरोज़गार युवाओं की संख्या 2025 में 14.7% तक बढ़ी, जबकि सरकारी रिपोर्टों में इसे 2026 में 11% तक घटाने का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे – विशेष रूप से कृषि‑उद्योगीकरण और डिजिटल कनेक्टिविटी – अभी तक ठोस रूप से लागू नहीं हुए हैं।

विपक्षी दलों, विशेष करके कांग्रेस और असमिया राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एएनडब्ल्यूआर) के प्रतिनिधियों ने इस जीत को ‘सिमित लोकतांत्रिक सहभागिता’ का परिणाम बताया। उनका तर्क है कि सीमांकन प्रक्रिया में विपक्षी दलों को समान अवसर नहीं मिला, और अभूतपूर्व टर्नआउट ने वास्तविक ‘विकल्प’ प्रस्तुत नहीं किया। इस आलोचना में तथ्यात्मक आधार है: कई ग्रामीण क्षेत्रीय बार्डर में मतदाता सूचनाओं का वितरण असमान रहा, जिससे ‘ज्वार‑भाटा’ की संभावना के सामने चुनावी प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं।

समग्रतः, असम में इस बार की जीत ने एक दोधारी तलवार प्रस्तुत की है। एक ओर, यह भारत के लोकतंत्र को बहुमत वाले एक स्थिर केंद्र को दिखाती है, जो नीतियों को तेज़ी से लागू कर सकता है। दूसरी ओर, यह प्रक्रिया में मौजूद त्रुटियों – सीमांकन में पारदर्शिता की कमी, नीति कार्यान्वयन में धीमी गति, और रोजगार‑संकट पर असंगत उपाय – को उजागर करती है। इन मुद्दों पर प्रशासन को ठोस जवाबदेही सिद्ध करनी होगी, वरना ‘भाजपा का अकेला बहुमत’ केवल राजनैतिक उपलब्धि ही रहेगा, वास्तविक जनसंतुष्टि की नहीं।

Published: May 5, 2026