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Category: भारत

असांसोल कॉलेज की रक्षक कक्ष के पास मिली बंद मोबाइल, चुनावी अनियमितता के आरोपों में भाजपा ने उठाया दलीय पक्षपात का प्रश्न

वेस्ट बंगाल के रानीगंज निर्वाचन क्षेत्र में असांसोल इंजीनियरिंग कॉलेज के मतदान कक्ष के पास एक लिफ़ाफ़े में बंद, बंद किया हुआ मोबाइल फ़ोन और कुछ दस्तावेज़ पाए गए। यह खोज 3 मई 2026 को हुई, जब चुनाव परिणामों की घोषणा के एक दिन पहले ईवीएम की सुरक्षा को लेकर प्रशासनिक तैनाती तेज़ थी।

भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता ने इस घटनाक्रम को “सभी अधिकारी टि एम सी के पक्ष में” के रूप में व्याख्यायित किया तथा संभावित धोखाधड़ी के आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि कंडक्टर, सुरक्षा गार्ड और कलेक्टर‐स्तर के अधिकारियों ने अपने कर्तव्यों का दुरुपयोग करके ट्राइएनामोल कांग्रेस को लाभ पहुंचाया हो सकता है। इस बयान में ‘भेदभाव’, ‘पक्षीय झुकाव’ और ‘अनियमितता’ शब्द प्रमुख थे, जो वर्तमान चुनावी माहौल में पहले से ही तनाव को बढ़ा रहे थे।

आधिकारियों की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक बयान नहीं मिला। हालांकि, पुलिस ने मामला सुरक्षित करने के लिए लिफ़ाफ़े को सीलबंद किया और फ़ोन को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं हुआ कि क्यूआर कोड या मोबाइल के डेटा में कोई असामान्य गतिविधि दर्ज हुई है या नहीं। प्रतीत होता है कि प्रशासन ने सुरक्षा प्रोटोकॉल के उल्लंघन की घोषणा करने के बजाय मौन राई चुन ली।

इसे केवल एक ‘यादृच्छिक’ वस्तु के रूप में नहीं देखा जा सकता। चुनावी प्रक्रिया में ईवीएम को सुरक्षित रखने के लिए “अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था” के आदेश जारी किए गए थे, परन्तु इस आदेश के तहत आवश्यक “दस्तावेज़‑भंडारण सिद्धान्त” और “परिचालन निगरानी” लागू नहीं हो पाई। लिफ़ाफ़े में एक मोबाइल के साथ जुड़े दस्तावेज़ जो रानीगंज के राजनीतिक स्थिति से संबंधित थे, यह दर्शाते हैं कि सूचना प्रवाह और दस्तावेज़ प्रबंधन में मौलिक खामियाँ मौजूद हैं।

नीति‑निर्माण के दृष्टिकोण से बात किया जाए तो निर्वाचन आयोग द्वारा जारी “इलेक्ट्रॉनिक मतदान मशीन सुरक्षा मानक (2025‑2026)” में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि मतदान कक्ष के निकट कोई अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक उपकरण नहीं रखा जाना चाहिए। इस मानक के उल्लंघन को लेकर तत्काल जांच और उत्तरदायित्व तय करने की प्रक्रिया में असफलता, प्रशासनिक सुस्ती को उजागर करती है। यदि ऐसा नियम मौजूद है, तो उसका अनुपालन न होना नीति‑कार्यान्वयन में गंभीर ढिलाई का संकेत देता है।

सामाजिक प्रभाव भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। नागरिकों का चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा इस प्रकार की घटनाओं से टूटता है, विशेषकर जब आधिकारिक संस्थाओं की जवाबदेही पर सवाल उठते हैं। जनता को आश्वस्त करने के लिए “स्थिरता” की बजाय “स्पष्ट जवाब” की जरूरत है, वरना चुनावी परिणामों की वैधता पर दीर्घकालिक संदेह उत्पन्न हो सकता है।

इन घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में प्रशासनिक सुधार आवश्यक है: (i) लापरवाह सुरक्षा मानकों पर पुनः समीक्षा, (ii) अनधिकृत वस्तुओं की त्वरित रिपोर्टिंग एवं फॉरेंसिक जांच की अनिवार्यता, (iii) पक्षीय झुकाव के आरोपों को निपटाने हेतु स्वतंत्र निरीक्षण टीम का गठन। इन उपायों के बिना वैध चुनावी प्रक्रिया का दावो निराधार रह जाएगा।

अंततः, असांसोल की इस छोटी‑सी घटना ने बड़े प्रश्न उठाए—क्या भारतीय लोकतंत्र की नींव पर बिखरते पक्षीय हितों की छाया है, या फिर मौजूदा संस्थागत ढांचा स्वयं अपनी दक्षता और जवाबदेही में विफल हो रहा है? यह समय है कि प्रशासनिक ढांचा इस चुनौती को गंभीरता से ले और नागरिकों को वह भरोसा दे, जिसके बिना चुनावी लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति अधूरी रह जाती है।

Published: May 3, 2026