जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: भारत

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

अखिलेश यादव का संकेत: कांग्रेस‑DMK संबंध टूटने पर 'परित्याग न करें' पोस्ट ने उठाया राजनीतिक प्रश्न

ताज़ा समय में अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर दो तस्वीरें साझा कीं—एक में पश्चिम बंगाल की अगुआ माँता बनर्जी और दूसरी में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के साथ—और साथ में भ्रामक वाक्यांश "जो नहीं छोड़ते" लिखा। यह संदेश, जो सतही तौर पर राष्ट्रीय एकता की पुकार लगती है, वास्तव में कांग्रेस‑ड्राविड़ीयन कड़ा (DMK) गठबंधन के टूटने तथा अभिनेता विजय द्वारा स्थापित तमिलग वैत्रि कज़हाग (TVK) को नई गठबंधन की पेशकश करने के बाद आया है।

कांग्रेस ने इस सप्ताह अपने दीर्घकालिक सहयोगी DMK के साथ रिश्ते तोड़ने और टीवीके को समर्थन देने का ऐलान किया। यह कदम, जो दो बड़े राज्य—तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल—में 2026 विधानसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में उठाया गया, INDIA ब्लॉक के भीतर पहले से ही तनावपूर्ण गठबंधन को और जटिल बना रहा है। इन दोनों राज्यों में माँता बनर्जी और एम.के. स्टालिन, दोनों ही राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के विरोधी प्रमुख प्रतिस्पर्धी हैं; उनका सामूहिक समर्थन अक्सर विरोधी ब्लॉक की जीत का निर्धारण करता है।

संकट की जड़ में, एक नीतिगत विफलता स्पष्ट होती है—केंद्र की सहयोगी दलों के साथ सामंजस्य स्थापित करने में मौजूदा प्रणाली की अक्षम्य धीरज। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, जिन्होंने पूर्व में गठबंधन को ‘एकजुट शक्ति’ कहा था, अब अचानक नीति‑परिवर्तन कर रहे हैं, जबकि आधार से जुड़ी रणनीतिक संवादहीनता स्पष्ट है। यह न केवल मतदाताओं के संदेह को बढ़ाता है, बल्कि चयन प्रक्रिया में संस्थागत जवाबदेही को भी धुंधला करता है।

संघीय स्तर पर इस खंडन के प्रभाव स्पष्ट हैं। तमिलनाडु में, DMK की गिरावट के साथ टीवीके का उदय एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रकट हो रहा है, परंतु इस नई इकाई के पास व्यापक प्रशासनिक अनुभव का अभाव है। बिना स्पष्ट नीति‑दिशा के, प्रतिभागी मंच केवल विद्रोह के रूप में दिखाई देता है, जहाँ प्रदर्शनात्मक वादे‑व्याख्यान से अधिक व्यावहारिक कार्य नहीं निकलते। इसी तरह, पश्चिम बंगाल में माँता बनर्जी के साथ जुड़ाव को रक्षात्मक रूप से देखा जा रहा है—जैसे कांग्रेस अपने ही गठबंधन को बचाने के लिए अतिप्रसार कर रही हो।

निजी‑सार्वजनिक सहयोग के ढांचे में भी खामियां स्पष्ट हैं। टीवीके जैसे अभिनेताओं‑प्रधान दल को समर्थन देने का निर्णय, असंगत नीति‑विकास का संकेत देता है, जहाँ लोकप्रिय संस्कृति को राजनयिक मंच पर संबल के रूप में उपयोग किया जा रहा है, बजाए ठोस विकास‑आधारित प्रतिबद्धताओं के। यह दर्शाता है कि शासन में ‘सिंहासन’ पर बैठ कर विचार करने के बजाय, तत्काल राजनीतिक लाभ के लिए प्रतिबंधित नीतिगत सरलीकरण किया जा रहा है।

अंत में, अखिलेश यादव का यह ‘परित्याग न करें’ पोस्ट, मूलतः एक संकेत है—कि कांग्रेस अपने रणनीतिक विकल्पों पर पुनर्विचार कर रही है, परन्तु यह पुनर्विचार दक्षिणी भारत में पहले से ही धूमिल हो चुका है। अगर प्रतिबद्धता केवल शब्दों में ही सीमित रहती है, तो यह न केवल वोटर बेस को भ्रमित करेगा, बल्कि उत्तरदायित्व‑पाठ्यक्रम में संस्थागत सुस्ती को और प्रेरित करेगा। राजनीतिक दलों को अब अपनी नीति‑निर्माण प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना चाहिए, गठबंधन‑संबंधी निर्णयों को सार्वजनिक एवं सटीक बनाना चाहिए, और सबसे महत्वपूर्ण—वोटर की भरोसे को पुनः स्थापित करने के लिए ठोस विकास‑संबंधी कार्यों को प्राथमिकता देना चाहिए।

Published: May 8, 2026