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Category: भारत

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NEET (UG) में चार राज्यों के उम्मीदवारों ने बनाया 41% का दबदबा, नीतिगत चुनौतियों पर सवाल

राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NEET) के नवीनतम आँकड़े दर्शाते हैं कि चार प्रमुख राज्यों ने मिलकर कुल आवेदकों के 41 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व किया है। यह असमानता न केवल प्राथमिक शिक्षा के स्तर में अंतर को उजागर करती है, बल्कि भारतीय स्वास्थ्य‑शिक्षा नीति के कार्यान्वयन में मौजूद त्रुटियों की ओर संकेत करती है।

हालिया डेटा के अनुसार, इन चार राज्यों में प्रवेश‑परीक्षा के लिये तैयारी करने वाले विद्यार्थियों की संख्या राष्ट्रीय औसत से अक्सर दो‑तीन गुना अधिक रही है। इसका मूल कारण शहरी‑केन्द्रित कोचिंग सेंटर, असंगत स्कूल‑स्तर की शैक्षणिक ढाँचा, तथा उच्च‑आय वाले परिवारों द्वारा प्रदान की जाने वाली अतिरिक्त संसाधन माना जा रहा है। परन्तु यही कारण उन जिलों में शारीरिक स्वास्थ्य‑सेवा और बुनियादी विज्ञान‑शिक्षा की कमी को और गहरा बना रहा है जहाँ प्रतिभागी संख्याएँ न्यूनतम हैं।

सरकारी प्रतिक्रियाओं की बात करें तो शिक्षा एवं स्वास्थ्य मंत्रालय ने कई बार क्षेत्रीय असमानता घटाने के लिये स्कॉलरशिप योजनाएँ एवं ऑनलाइन शिक्षण प्लेटफ़ॉर्म लॉन्च किये हैं। वास्तविकता यह है कि इन पहलों की निगरानी एवं वितरण में संस्थागत सुस्ती स्पष्ट दिखती है। कई राज्यों में परिचालन प्रतिबंध, धनराशि का अनुचित आवंटन और लाभार्थी चयन में पारदर्शिता की कमी ने नियोजित प्रभाव को कमजोर कर दिया है।

नीति‑निर्माण प्रक्रिया में एक प्रमुख त्रुटि यह है कि कोचिंग‑इकोसिस्टम को सुधारने के लिये ‘सिर्फ संख्या’ को लक्ष्य बना लिया गया, जबकि मूलभूत बुनियादी ढाँचे में सुधार को प्राथमिकता नहीं दी गई। परिणामस्वरूप, उच्च‑अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों की तुलना में, समान सामाजिक‑आर्थिक पृष्ठभूमि वाले छात्रों की भागीदारी व निरंतरता बहुत कम रहती है।

पारदर्शिता एवं जवाबदेही के अभाव को उजागर करने वाले यह आँकड़े राष्ट्रीय स्तर पर नीति‑निर्धारकों को संकेत देते हैं कि केवल आर्थिक प्रोत्साहन ही पर्याप्त नहीं है; सतत निगरानी, स्थानीय स्तर पर शैक्षिक संस्थानों का सुदृढ़ीकरण, तथा सार्वजनिक‑निजी साझेदारी की प्रभावी योजना भी जरूरी है। इसके बिना आगामी वर्षों में भी NENE (UG) में प्रदेशीय असंतुलन जारी रह सकता है, जिससे स्वास्थ्य‑सेवा कर्मियों की योग्यता एवं वितरण पर दीर्घकालिक असर पड़ेगा।

समग्र रूप से कहा जा सकता है कि चार राज्यों ने राष्ट्रीय स्तर पर 41 प्रतिशत आवेदकों का मोठा हिस्सा लिया है, परन्तु यह आंकड़ा भारत की शैक्षिक प्रणाली में गहरी असमानता की भी ओर इशारा करता है। नीति‑निर्माण की क़दम‑बद्ध समीक्षा, संस्थागत जवाबदेही को सुदृढ़ करना, और बुनियादी शिक्षा‑सुविधाओं का सुसंगत विकास ही इस विषमता को समाप्त करने का एकमात्र व्यावहारिक मार्ग हो सकता है।

Published: May 7, 2026