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DMK सांसद कानिमोशी ने कांग्रेस से अलग बैठने की मांग की, संधि‑विच्छेद के बाद संसद में नई व्यवस्था की अपील
तमिलनाडु की प्रमुख दल द्रविड़ मुन्नैत्र कड़्रन (DMK) की सांसद कानिमोशी ने आज लोह सभा के अध्यक्ष, ओम बिरला को एक औपचारिक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने DMK प्रतिनिधियों को कांग्रेस के बगल में बैठने वाले वेन्यू से हटाकर अलग बैंड में रखने का अनुरोध किया। यह अनुरोध दो दशकों से चली आ रही गठबंधन‑विरोधी गठबंधन‑बंद की समाप्ति के बाद आया है, जो हालिया राज्य‑स्तर के चुनावों में दोनों दलों के मतभेद के कारण तेज हो गया था।
पत्र में कानिमोशी ने बताया कि कांग्रेस ने राज्य‑स्तर में गठबंधन के बाद केंद्र में एक अन्य दल को सत्ता में लाने के लिए अपना समर्थन बदल दिया, जिससे DMK को ‘धोखा’ और ‘विश्वासघात’ का सामना करना पड़ा। इस कारण, उन्होंने कहा, “परिचित बेंचिंग व्यवस्था अब वास्तविक राजनीतिक प्रतिच्छेद को प्रतिबिंबित नहीं करती” और “वर्तमान व्यवस्था से उत्पन्न होने वाले भ्रम और अनावश्यक तनाव को रोकने के लिये नई बैठने की व्यवस्था अनिवार्य है”।
इस कदम के पीछे प्रशासनिक और नीतिगत महत्त्व को समझना आवश्यक है। भारत में संसद की बेंचिंग का निर्धारण ‘स्पीकर द्वारा निर्धारित नियमों’ के अन्तर्गत किया जाता है, जिसमें राजनीतिक गठबंधन, दलों की ताकत और सदस्यता की संख्या को ध्यान में रखा जाता है। जबकि इस प्रक्रिया का मूल उद्देश्य सदस्यों के बीच संवाद और सहयोग को सरल बनाना है, इसके पीछे का प्रशासनिक ढांचा अक्सर द्विदिशी प्रतिस्पर्धा और दलों के व्यक्तिगत हितों को संतुलित करने में कुशल नहीं रह पाता।
कानिमोशी की यह मांग संसद की बेंचिंग प्रणाली की ऐतिहासिक अक्षमता को उजागर करती है। दो दशकों तक एक ही गठबंधन बनाये रखने के बाद अचानक संधि‑विच्छेद के बाद बेंचिंग में बदलाव की माँग न केवल प्रक्रियात्मक जटिलता को दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि मौजूदा प्रोटोकॉल में आकस्मिक राजनीतिक बदलावों के लिये लचीलापन नहीं है। इस लचीलापन की कमी का परिणाम अक्सर ‘स्थायी अस्थिरता’ के रूप में सामने आता है, जहाँ दलों को अपनी सम्पूर्ण रणनीति फिर से तैयार करनी पड़ती है, जबकि संस्थागत उत्तरदायित्व स्पष्ट नहीं होता।
स्पीकर के पास इस प्रकार की अपील को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार है, परंतु वर्तमान में इस परस्पर विरोधी दलों के बीच संघर्ष के दौरान कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला है। इस स्थिति में प्रशासनिक प्रतिक्रिया में स्पष्टता और समयबद्धता की कमी न केवल संसद की कार्यक्षमता को धुंधला करती है, बल्कि सार्वजनिक भरोसा भी घटाती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में, न केवल नौकरशाहों की, बल्कि कार्यकारी और विधायी संस्थानों की जवाबदेहि को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है, जिससे ऐसी ‘सिंहासन‑अपरिवर्तित’ स्थितियों से बचा जा सके।
राजनीतिक दृष्टि से देखा जाये तो, इस प्रकार की बेंचिंग परिवर्तन की माँग न केवल DMK की ‘राजनीतिक पुन:स्थापना’ का संकेत है, बल्कि यह भी इंगित करता है कि कांग्रेस‑DMK के बीच गठबंधन‑भ्रष्टाचार की लकीरें अब धुंधली हो गई हैं। यह रीऑरेंजमेंट न केवल पार्टी‑विशेष के भीतर मतभेदों को उजागर करता है, बल्कि सार्वजनिक रूप से यह संदेश देता है कि गठबंधन‑परिवर्तन के बाद भी संसद में मूलभूत संरचनात्मक संस्थानों को ‘स्थायी अभाव’ का सामना करना पड़ रहा है।
इस संदर्भ में, नीति‑निर्माताओं को ‘संसदीय बेंचिंग’ के नियमों की पुनः समीक्षा करनी चाहिए, जिससे आकस्मिक गठबंधन‑विच्छेद या नई गठनियों के उदय पर तुरंत एवं पारदर्शी समाधान लागू हो सके। ऐसी नीति‑परिवर्तन न केवल प्रशासनिक लचीलापन बढ़ाएगी, बल्कि चुनावी परिणामों की अनपेक्षित प्रतिबंधों को भी कम करेगी।
सारांशतः, कानिमोशी की अपील एकल‑धारा‑परिवर्तन की माँग नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में संस्थागत जवाबदेही, प्रशासनिक दक्षता और नीति‑निर्माण की दृढ़ता को चुनौती देती है। यह देखना शेष है कि लोह सभा का स्पीकर इस अपील को किस समय‑सीमा में और किस स्वरूप में उत्तर देंगे, तथा क्या यह प्रतिक्रिया संसद की कार्यवाही को ‘पर्याप्त प्रतिनिधित्व’ के सिद्धांत के अनुकूल बना पाएगी।
Published: May 8, 2026