45 वर्ष के बाद अस्पताल में भर्ती जोखिम दो गुना, वृद्ध जनसंख्या पर स्वास्थ्य भार में तेज़ी
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसओ) के हालिया सर्वेक्षण ने भारत में 45 वर्ष के बाद अस्पताल में भर्ती होने का जोखिम लगभग दो गुना हो जाने का खुलासा किया है। विशेषकर 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में यह जोखिम और भी अधिक है, जिससे पुरानी बीमारियों से जुड़ी रोग भारा में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है।
ऐसे आंकड़े न केवल एक सामाजिक‑आर्थिक चेतावनी देते हैं, बल्कि स्वास्थ्य प्रशासन के सामने गहरी नीतिगत विफलताओं को उजागर करते हैं। मौजूदा राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2025 ने प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को सुदृढ़ करने और रोकथाम पर बल देने का वादा किया था, पर अभ्यास में यह वादा अक्सर खाली शब्द बना रहता है।
सरकार ने आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के माध्यम से रोगियों को आर्थिक राहत देने का लक्ष्य सेट किया है, पर इन योजनाओं का मुख्य ध्यान इलाज पर है, न कि रोग होने से पहले रोकथाम पर। परिणामस्वरूप, दीर्घकालिक रोगों की रोकथाम के लिए पर्याप्त स्क्रीनिंग, समय पर निदान और स्वस्थ जीवनशैली को प्रोत्साहित करने वाले कार्यक्रमों का अभाव स्पष्ट है।
स्थानीय स्तर पर, कई प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में आवश्यक उपकरणों की कमी, गेरियाट्रिक विशेषज्ञों की अनुपलब्धता, और साक्षरता की अद्यतन जानकारी का अभाव यह दर्शाता है कि संस्थागत सुस्ती ने सामाजिक लागत को और बढ़ा दिया है। इसके अलावा, आँकड़े यह भी संकेत देते हैं कि अस्पताल में भर्ती होने वाले वयस्कों की संख्या में निरंतर बढ़ोतरी के साथ, सार्वजनिक अस्पतालों की बिस्तर क्षमता, औषधीय आपूर्ति और स्टाफिंग में बड़ी खामियों का सामना कर रहा है।
व्यवस्था की इस कमजोरी को देखते हुए, नीति नियंताओं को तत्काल तीन‑स्तरीय रणनीति अपनाने की आवश्यकता है:
सरकारी दावों और वास्तविक कार्यान्वयन के बीच लगातार अंतर एक अभ्यस्त संस्थागत उत्तरदायित्वहीनता को दर्शाता है। जब सरकार ने कहा कि "हर रोगी को मुफ्त इलाज मिलेगा", शायद यह विचार नहीं किया गया कि रोगी खुद ही बनने की प्रक्रिया में पड़ते हैं। इस असंगतियों को दूर करने के लिये, वित्तीय ऑडिट, समय-समय पर सार्वजनिक रिपोर्ट और स्वतंत्र निगरानी संस्थाओं की स्थापना अनिवार्य है।
संक्षेप में, एनएसओ के आंकड़े न केवल एक स्वास्थ्य संकट का संकेत देते हैं, बल्कि मौजूदा नीतियों की अपर्याप्तता और प्रशासनिक सुस्ती की स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं। यदि नीति निर्माताओं ने रोकथाम, प्रारम्भिक निदान और वृद्ध आबादी की विशेष देखभाल को प्राथमिकता नहीं दी, तो अगले दशक में अस्पताल में भर्ती की लागत और मानव जीवन दोनों में और बढ़ोतरी अनिवार्य होगी।
Published: May 4, 2026