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Category: भारत

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2024 में बाल अपराध में 6% की बढ़ोतरी, घरेलू हिंसा में पति‑परिवार की क्रूरता ने किया 1.2 लाख से अधिक रिकॉर्ड

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा जारी 2024 के आंकड़ों ने दो तीव्र प्रवृत्तियों को उजागर किया है—बच्चों के खिलाफ अपराधों में लगभग छह प्रतिशत की वृद्धि और महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा में पति‑परिवार की कठोरता के कारण प्रतिवर्ष एक लाख से अधिक शिकायतें। यह द्विआधारी वृद्धि न केवल सामाजिक बुनियाद को चुनौती देती है, बल्कि नीति-निर्माण और प्रशासनिक जवाबदेही के मौजूदा ढाँचे की कमजोरी को भी स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

डेटा के अनुसार, 2024 में बाल अपराधों की कुल संख्या 2019‑2023 की औसत तुलना में 6% अधिक रही, जिसमें विशेषकर अपहरण और यौन उत्पीड़न के मामलों में उल्लेखनीय उछाल देखा गया। वहीं, महिलाओं के खिलाफ कुल अपराधों में हल्की गिरावट दर्ज हुई, परंतु ‘पति‑परिवार द्वारा अत्याचार’ वर्ग में 1.2 लाख से अधिक मामलों की रिपोर्ट आई, जो पूरे वर्ष में सबसे प्रमुख अपमानजनक घटना बनी रही।

सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कई योजनाएँ—जैसे कि महिला सुरक्षा योजना, एक‑स्टॉप‑सेन्टर (OSC) नेटवर्क, और बाल संरक्षण मंच—की घोषणा की है। तथापि, आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दिखता है कि इन पहलों का व्यावहारिक कार्यान्वयन अभी भी अधुरा है। कई राज्यों में OSC की सुविधाएँ सीमित हैं, जबकि पुलिस प्रशासन के हाथों में बाल अधिकार मामलों के लिए विशेष प्रशिक्षण की अनुपस्थिति निरंतर मुद्दा बनी रहती है।

नीति‑निर्माताओं का यह तर्क कि “सतही संख्या में गिरावट ही सुधार का संकेत है” अब तक के निरंतर डेटा‑संचालन को नजरअंदाज करता है। वास्तविक सुधार तब सम्भव है, जब अधिनियमित ढाँचे के साथ-साथ जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता, सामाजिक संगठनों और पुलिस के बीच समन्वय को सुदृढ़ किया जाए। वर्तमान में, केवल आंकड़ों को रिपोर्ट करके संतुष्ट होना, उन 1.2 लाख महिलाओं और बढ़ते बाल पीड़ितों की पीड़ा को ‘संख्यात्मक सफलता’ के रूप में पेश करता है, जो कि एक गहरी प्रशासनिक सुस्ती की संकेतक है।

जब सरकार “सुरक्षा” शब्द का प्रयोग करती है, तो अक्सर आँकड़ों के पीछे छिपे वास्तविक मानवीय संकट को अनदेखा कर देती है। नाबालिगों के खिलाफ अपराधों में वृद्धि के पीछे न केवल सामाजिक कारक हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में देरी, पुलिस की लो‑केस फाइलिंग, और पीड़ित‑सुरक्षा के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे की कमी भी कारक हैं। इसी प्रकार, पति‑परिवार द्वारा महिलाएँ सामना कर रही अत्याचार की प्रवृत्ति इस बात का संकेत देती है कि घर की चारदीवारी में मौजूद ‘सुरक्षा’ की अवधारणा को पुनः परिभाषित करने की सख्त आवश्यकता है।

आगे की नीति दिशा स्पष्ट होनी चाहिए: प्रथम, बाल अपराध के सभी वर्गों के लिए त्वरित और ट्रैक करने योग्य एंट्री‑टू‑एंड प्रक्रिया बनाना; द्वितीय, घरेलू हिंसा के मामलों में জরুরি मदद के लिए 24‑घंटे कॉल सेंटर और स्थानीय पुलिस स्टेशन के बीच वास्तविक‑समय लिंक स्थापित करना; तथा तृतीय, सभी राज्य सरकारों को न्यूनतम मानक के रूप में ‘महिला‑सुरक्षा इकाई’ स्थापित करने का निर्देश देना, जो न केवल आँकड़ों को संग्रहित करे बल्कि निष्कर्षित डेटा के आधार पर सक्रिय हस्तक्षेप भी करे।

सारांशतः, 2024 के आँकड़े एक कड़े सचेतनात्मक संदेश प्रदान करते हैं—कि मौजूदा नीतियों और संस्थागत तंत्रों में पर्याप्त जाँच‑पड़ताल और सुधार की आवश्यकता है। यदि प्रशासनिक जवाबदेही को सच्चा माना जाता है, तो वह केवल रिपोर्टिंग से नहीं, बल्कि प्रत्येक शिकायत के पीछे के कारणों की जड़ तक पहुँचा कर समाधान तक पहुँचाने में ही निहित होगी। तभी बाल अधिकार और महिलाओं की सुरक्षा को शब्द‑भाषा की बजाय वास्तविकता में बदला जा सकेगा।

Published: May 7, 2026