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2024 में 1.10 लाख से अधिक दोपहिया सवार और पादचारी सड़क मौतें: नीति‑व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न
रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत की सड़कों पर 1,10,000 से अधिक दोपहिया सवार व पादचारी मारिए गए। यह आंकड़ा पिछले वर्ष से लगभग दो प्रतिशत अधिक है और दर्शाता है कि मौजूदा रूटीन सुरक्षा उपायों ने अभी तक प्रभावी रोकथाम नहीं की है।
सड़क सुरक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, मृत्युदर में सबसे अधिक योगदान उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और बिहार के हाईवे एवं शहरी सड़कों से आया है। इस वर्ष केवल पाँच प्रमुख शहरों – दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, मुंबई और पुणे – में ही कुल मौतों का लगभग एक‑तिहाई दर्ज किया गया।
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में ‘विज़न ज़ीरो’ पहल, हेलमेट अनिवार्यता, तेज़ गति सीमा नियंत्रण एवं ‘सड़क सुरक्षा योजना 2022‑27’ जैसी नीतियां लागू कीं। तथापि इन नीतियों का वास्तविक कार्यान्वयन कई स्तरों पर विफल रहा है। अधिकांश राज्यों में हेलमेट उपयोग दर राष्ट्रीय औसत 55 % पर अडिग है, जबकि लक्ष्य 2025 तक 90 % था। इसी तरह, गति नियंत्रण कैमरे की स्थापना में 2024‑25 बजट में आवंटित राशि का केवल 38 % ही वास्तविक तौर पर लागू हुआ।
स्थानीय प्रशासन की सुस्ती भी इस आकस्मिक त्रासदी में योगदान दे रही है। कई शहरों में सड़क की खराब सतह, अधूरी बारीक सड़क रोशनी और पादचारी फुटपाथ की कमी—ये समस्याएँ राष्ट्रीय स्तर की रिपोर्टों में बार‑बार उजागर हुई हैं, पर कार्यवाही अक्सर ‘संकल्प में रह गई’। तदिल्ली में 2023‑24 में शुरू किए गए सतह सुधार कार्यों को 2024 में केवल 12 % पूर्णता मिली, जबकि लक्ष्य था 80 %।
सार्वजनिक परिवहन को विकल्प बनाने की नीति के बावजूद, कई क्षेत्रों में बस‑सेवा की कमी या अनियमितता ने लोगों को दोपहिया उपयोग करने के लिए मजबूर किया। इसका प्रत्यक्ष असर पादचारी सुरक्षा में देखा गया – जहाँ पादचारी ओवरब्रीज, फुटपाथ न होने आदि कारणों से अराजकता में झपटे मारते हैं, वहीँ दुर्घटना जोखिम बढ़ता है।
कुल मिलाकर, 2024 का आँकड़ा इस बात का सबूत है कि नीति‑निर्माण और जमीन‑स्तर की कार्यवाही में कड़ी असंगति है। राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा परिषद ने 31 जनवरी को एक विशेष समिति गठित कर ‘सुरक्षा‑अवसर’ पर रिपोर्ट तैयार करने का वादा किया था, पर अभी तक कोई वास्तविक निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किया गया। यह देरी प्रशासनिक लापरवाही की एक पुष्टि है।
नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने सरकार से स्पष्ट उत्तरदायित्व की मांग की है। भारतीय सिटी सॉलिडैरिटी फाउंडेशन के प्रवक्ता ने कहा, “यदि ‘विज़न ज़ीरो’ को शब्द‑आधारित ढाँचा ही रहना है, तो यह केवल एक प्रचार‑स्लोगन बन कर रहेगा। वास्तविक बात तो यह है कि हर एक पादचारी और दोपहिया सवार को सुरक्षित लौटाने के लिये ठोस नियामक तंत्र, नियमित निरीक्षण और फुर्तीला आपात‑प्रतिक्रिया प्रणाली आवश्यक है।”
अंततः, 2024 में दर्ज 1.10 लाख से अधिक मौतें न केवल संख्यात्मक आँकड़ा हैं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा के प्रति व्यवस्थित लापरवाही का प्रतिबिंब भी। यह प्रश्न उठता है कि क्या नीति‑निर्माण में अधिक ‘जर्नी‑मैप’ और कम ‘जारी‑पहिया’ होगा, और क्या प्रशासनिक प्रबंधन की चटनी में सच्ची जवाबदेही मिल पाएगी। समय अब नीति‑कार्यों को वास्तविक कार्य‑क्षेत्र में उतारने का, नहीं तो आंकड़े ही आगे बढ़ते रहेंगे।
Published: May 8, 2026