जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: भारत

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

2014 के बाद मुस्लिम विधायकों के लिए राजनीतिक स्थान घटता गया

दिसंबर 2014 में राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता परिवर्तन के बाद से भारतीय संसद और राज्य विधानसभाओं में मुस्लिम विधायक वर्ग की प्रतिनिधित्व में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। 2014 में राष्ट्रीय स्तर पर 71 मुस्लिम सांसद थे, जो पाँच साल बाद 2024 में 53 तक घट गया; इसी प्रकार कई बड़ी राज्यों की विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या 2014 के सशर्त 2‑3% के स्तर से अब मात्र 1% से भी कम हो गई है। यह आकड़ा न केवल मौखिक प्रतिवाद का विषय बनता है, बल्कि यह सार्वजनिक नीति, चुनावी रणनीति और प्रशासनिक उत्तरदायित्व के मूलभूत प्रश्न उठाता है।

मुख्य कारणों में दो कारक प्रमुख हैं। पहला, सत्ता में आए प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी द्वारा चुनावी गठबंधन में मुस्लिम हिस्से को न्यूनतम रखने की रणनीति, जो ‘बहुसंख्यक‑बहुरूपी’ गढ़ते हुए अल्पसंख्यकों को वोट‑बोर्ड पर कम घुसी हुई दिखती है। दूसरी ओर, 2016 में लागू सिटीजनशिप संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण अधिनियम (NRC) जैसी नीतियों ने सामाजिक-राजनीतिक माहौल को तीखा कर दिया, जिससे कई मुसलमान सांसदों को अपने क्षेत्रों में ‘विरोधी माहौल’ का सामना करना पड़ा। इन नीतियों के खिलाफ अभिव्यक्ति के लिए अक्सर ‘राष्ट्रवादी’ लेबल से दंडित किया गया, जिससे दलों के भीतर मुस्लिम विधायक की आवाज़ दबाने की प्रक्रिया तेज हुई।

प्रशासनिक स्तर पर इस गिरावट को स्वीकृति नहीं मिल पाई। कई मौजूदा प्रांतों ने ‘विधायी सशक्तिकरण योजना’ घोषित करने का दावा किया, परन्तु वास्तविक कार्यान्वयन में कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। बहु‑स्तरीय आयोगों की रिपोर्टें अक्सर ‘डेटा‑संग्रह में कमी’ और ‘जवाबदेही की कमी’ को ही उजागर करती हैं। इस स्थिति में, संसद और विधानसभा के भीतर गैर‑मुस्लिम बहुमत के नियंत्रण से बहिष्करण की प्रक्रिया को ‘संकल्पना‑व्यवस्था’ कहा जा सकता है, जहाँ विभेदकारी नीतियों की समीक्षा के लिए कोई प्रभावी तंत्र कार्यरत नहीं है।

निहित परिणाम स्पष्ट हैं। नीति निर्माण की प्रक्रिया में विविधता का अभाव, सामुदायिक असुरक्षा की बढ़ती भावना, तथा विकास कार्यों में असमानता—इनसे सामाजिक ताने‑बाने को नुकसान पहुँच रहा है। वही प्रशासनिक अडचनें, जो ‘स्थायित्व‑भानु’ के रूप में कार्य करती हैं, उन्हें सुदृढ़ करने की बजाए मौजूदा असंतोष को स्थायी बनाकर रखती हैं। तब तक जब तक दलियों और शासक वर्गों के बीच ‘विचारधारा‑संतुलन’ की प्रस्थापना नहीं होती, तब तक मुस्लिम विधायक वर्ग के लिए राजनीतिक स्थान घटता ही रहेगा।

Published: May 7, 2026