पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में बालहत्या मामले में अभियुक्तों की जमानत याचिका पर सुनवाई
एक उत्तर भारतीय जिले में घटित एक घोर अंधविश्वासी कृत्य के संदेह में जांच शुरू होने के बाद, दो महिलाएँ और एक पुरुष, जो स्थानीय तांत्रिक तथा उनके सहयोगी के रूप में पहचान में आए, पर महिला बालहत्या, हत्या, और कृत्यरूप अपराध का आरोप लगा। अभियुक्तों को यह बतलाया गया कि उनका उद्देश्य अपने छोटे बेटे की ‘घातक बीमारी’ को समाप्त करने के लिए एक नाबालिग कुंवारी लड़की का बलिदान करना था, जिसे उन्होंने धार्मिक अनुष्ठान के रूप में न्यायोचित ठहराया। इस घटना को लेकर स्थानीय सार्वजनिक भावना तीव्र थी, क्योंकि पीड़िता नाबालिग का शरीर ग्राम के किसी खुले बगीचे में पाया गया, जहाँ से उसे दो भागों में विभाजित किया गया था। अभियुक्तों के खिलाफ भारतीय दण्ड संहिता के तहत 'हत्याकर हत्या', 'बालहत्या' और ‘बिना अनुमति के शव निर्वचन’ के प्रावधानों के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। अब इस मामले में अभियुक्तों ने तत्काल जमानत की याचिका दायर की है, जिसमें उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया के तहत अपने अधिकारों की रक्षा का आग्रह किया है।
जांच की शुरुआत में स्थानीय पुलिस ने स्वयं के भरोसे पर कई गवाहों से बयान दर्ज किए, जिन्होंने बताया कि एक महीने पहले ही पीड़िता की माँ वार-वार अपने बेटे की बीमारी की खबर सुनकर तांत्रिक से परामर्श लेती रही। तांत्रिक ने उन्हें बताया कि रोगी को ‘शुद्धिकरण’ के लिए एक कुंवारी लड़की को बलिदान देना आवश्यक है। उक्त अनुष्ठान में, तांत्रिक ने एक लकड़ी की छड़ी को पीड़िता के गुप्तांगों में प्रवेश किया, तथा एक सहयोगी ने पीड़िता के सिर पर आक्रमण किया। इस दौरान कई ग्रामीण लोगों ने अपने-अपने घरों से देखे जाने वाले अनुष्ठान की जाँच नहीं की। इस प्रकार की अन्धविश्वासी प्रक्रिया स्थानीय सरकारी अधिकारियों को भी अकल्पनीय रूप से ‘सामान्य’ प्रतीत हुई। अधिकतर पहचान योग्य साक्ष्य की कमी के कारण, पुलिस ने डिजिटल निगरानी, मोबाइल डेटा और ई-कॉमर्स रेकॉर्ड को भी सम्मिलित करके अभियोक्ता की ओर से मजबूत केस बनाते हुए, पीड़िता के शव को बचाव में पाए गए कलंक के साथ समाप्त किया।
अभियोजन पक्ष ने हाल ही में पेश किए गए कर्तवी प्रमाणों को विस्तृत रूप से उजागर किया। फोरेंसिक रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर पर विभिन्न औषधीय पदार्थों के साथ-साथ ज्वैलरी एवं कपड़ों के निचले हिस्से में लकड़ी के टुकड़े के निशान मिले। डिएनए परीक्षण ने यह सुनिश्चित किया कि पीड़िता के शरीर के ऊतक मौजूद हैं और हत्या का समय वाकई उल्लिखित रात के बाद का था। डिजिटल साक्ष्य में मोबाइल कॉल लॉग ने दिखाया कि अभियुक्तों ने अनुष्ठान से पूर्व तांत्रिक को कई बार संपर्क किया था, तथा रंगीन फोटो और वीडियो संदेश भी अधिग्रहित किए गए, जिसमें रीतियों के अनुसार “बलि” के लिए तैयारियों का उल्लेख था। गवाहों के बयान इस बात की पुष्टि करते हैं कि अनुष्ठान के दौरान एक ‘भयानक गीत’ गाया गया, जहाँ तांत्रिक ने “सभी रोगों को समाप्त करने के लिए शुद्ध बलि” की बात कही। इन सबके अलावा, स्थानीय स्वास्थ्य विभाग के आधिकारिक रेकॉर्ड से यह पता चलता है कि पीड़िता के पिता ने लगातार कई बार चिकित्सकीय सहायता लिए थी, परन्तु किसी भी चिकित्सकीय उपचार ने रोग को कम नहीं किया, जिससे अंधविश्वास का ञावासन और अधिक स्पष्ट हो गया। अभियोजन ने यह तर्क दिया कि अभियुक्तों ने जानबूझकर खून और हिंसा को बढ़ावा दिया, जिससे न केवल बालहत्या बल्कि कदाचार, अश्लीलता और सार्वजनिक स्वच्छता पर भी गंभीर सवाल उठते हैं।
अभियुक्तों की रक्षा पक्ष ने इस जमानत याचिका में प्रमुख वकील के रूप में अधिवक्ता सिमरनजीत सिंह सिद्धू, जो पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में आपराधिक कानून का अभ्यास करते हैं और चंडीगढ़ स्थित सिमरनलॉ नामक विधि फर्म से जुड़े हैं, को नियुक्त किया है। वकील सिद्धू ने मुख्य रूप से साक्ष्य की वैधता पर प्रश्न उठाए और कहा कि कई फोरेंसिक नमूनों को उचित क्रम में संग्रहित नहीं किया गया, जिससे संभावित दूषितता का जोखिम बना है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अनुष्ठान में उपयोग किए गये औषधीय पदार्थों का उन्नत प्रयोग केवल धार्मिक कारणों से नहीं, बल्कि निजी लाभ के इरादे से किया गया हो सकता है, जो अभियोजन के सिद्धांत को कमजोर करता है। साथ ही, रक्षा ने कहा कि पूरे प्रकरण में पुलिस द्वारा अति-आक्रमण और गवाहों के दबाव का दोहन भी देखा गया, जिससे किसी भी स्वर में ‘स्वेच्छा’ की अभिव्यक्ति पर संदेह उत्पन्न होता है। उन्होंने यह अनुरोध किया कि अभियुक्तों को जेल में रहने की बजाय जेलिए रखरखाव के बजाय ‘न्यायिक देखरेख’ में रखा जाए, क्योंकि उनके पास स्थानीय सामाजिक नेटवर्क की मदद से साक्ष्य को मोडिफाई करने की संभावनाएँ बहुत अधिक हैं। इस प्रकार की सामग्री के आधार पर, रक्षा ने न्यायालय से तुरंत जमानत प्रदान करने और अस्थायी रिहाई की अनुमति देने का आह्वान किया।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कई प्रमुख बिंदुओं को वस्तुनिष्ठ रूप से परखते हुए, अभियुक्तों की जमानत के लिए प्रस्तुत अनुरोध को गहरी जांच के अधीन रखा। न्यायालय ने यह इंगित किया कि बालहत्या और बलिदान जैसा गंभीर अपराध सामाजिक शांति के लिये बड़ा खतरा पैदा करता है, और ऐसे मामलों में न्यायिक कड़ाई आवश्यक है। जमानत के निर्णय में, न्यायालय ने यह विचार किया कि अभियुक्तों को जेल में रखने से न्यायिक प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ेगा, साथ ही यह भी जांचा कि क्या उन्हें जेल में रखने से प्रमाण छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने की संभावना है। अदालत ने यह भी माना कि अभियुक्तों की पेशेवर पृष्ठभूमि, यानी स्थानीय व्यापारी एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में, वे कभी भी न्यायिक आदेशों का उल्लंघन नहीं करेंगे, परन्तु अनिश्चितता को देखते हुए उन्होंने अस्थायी जमानत के साथ ‘स्थिर जेल रखरखाव’ के विकल्प को विचाराधीन रखा। न्यायालय ने यह बात पर बल दिया कि ‘निर्णय का भार’ केवल अपने-अपने अधिकारों के उपर नहीं, बल्कि बर्बरता के विरुद्ध सामाजिक संदेश को भी प्रतिबिंबित करना चाहिए। इस प्रकार, जमानत याचिका को ‘अस्थायी रूप से अस्वीकार’ किया गया, और आगे की सुनवाई में सबूतों के विस्तृत मूल्यांकन के बाद पुनः विचार करने का आदेश दिया गया।
विचारात्मक दृष्टिकोण से इस मामले में कई कानूनी प्रश्न उठते हैं। प्रथम, बालहत्या के गंभीरता को देखते हुए ‘जमानत की स्वीकृति’ के मानक में न्यायालय को यह देखना चाहिए कि अभियुक्तों के पास ‘मॉव्य जोखिम’ या ‘साक्ष्य छेड़छाड़’ की संभावना है या नहीं। द्वितीय, फोरेंसिक और डिजिटल साक्ष्य की विश्वसनीयता को चुनौती देने पर, न्यायालय को इस बात की जाँच करनी चाहिए कि क्या इन साक्ष्यों की ‘प्रक्रिया अनुक्रम’ और ‘सेवन’ के दौरान कोई अनियमितता रही है। तृतीय, अभियुक्तों को ‘तनाव के कारण’ या ‘धार्मिक अंधविश्वास’ के आधार पर ‘न्यायसंगत कारण’ का दावा नहीं किया जा सकता, क्योंकि भारतीय दण्ड संहिता में ‘अपराधी मंशा के अभाव’ के बावजूद ऐसे कृत्य को ‘गंभीर अपराध’ माना गया है। चौथा, न्यायालय को ‘जमानत के समयसापेक्षता’ को भी ध्यान में रखना होगा, क्योंकि इस प्रकरण में पीड़िता की उम्र, सामाजिक उत्पीड़न और अन्य अपराधों के संभावित संबन्ध को देखते हुए, न्यायिक प्रतिक्रिया को ‘समान न्याय’ सिद्धान्त के आधार पर संतुलित करना आवश्यक है। अंतत:, यह मामला ‘सार्वजनिक नीति’ के तत्व को भी उजागर करता है, जहाँ अंधविश्वास के कारण अपराध करने वाले सामाजिक संरचनाओं की ‘सुरक्षा’ पर प्रश्न उठते हैं, तथा यह भी सिद्ध करता है कि न्यायिक व्यवस्था को ‘भौतिक साक्ष्य’ और ‘साक्षी गवाही’ के संतुलन के साथ आगे बढ़ना चाहिए। इन सभी को देखते हुए, न्यायालय का निर्णय भविष्य में समान मामलों में ‘जमानत मानदंड’ और ‘साक्ष्य की वैधता’ के मूल्यांकन में एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रदान करेगा।
आगे की कार्यवाही इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या अभियोजन पक्ष अपने बिंदु स्पष्ट कर पाता है और तबाबंधी के साथ कानूनी रूप से ‘साक्ष्य प्रस्तुति’ को मजबूत कर पाता है। यदि अतिरिक्त डिजिटल फ़ाइलें, ग्राफ़िक रिकॉर्ड तथा गवाहियों का विश्लेषण किया गया, तो यह संभव है कि न्यायालय इस मामले में ‘आधारित सजा’ की दिशा में आगे बढ़े। सामाजिक दृष्टिकोण से, इस प्रकार की ‘धार्मिक अंधविश्वास से प्रेरित हत्या’ ने सार्वजनिक चेतना को जागरूक किया है, और यह उम्मीद की जा रही है कि स्थानीय प्रशासन एवं पुलिस विभाग भविष्य में ‘ऐसे कृत्यों को रोकने’ के लिये अधिक सख्त निगरानी और सूचना तंत्र स्थापित करेंगे। न्यायिक प्रक्रिया की प्रगति के साथ-साथ यह केस यह स्पष्ट करेगा कि भारतीय कानूनी व्यवस्था में ‘अत्याचार’ की रोकथाम एवं ‘पुनरावृत्ति को निवारण’ के लिये किस प्रकार के ‘समान्य उपाय’ लागू किए जा सकते हैं। अंततः, इस मामले की जमानत याचिका की अस्वीकृति ने यह संकेत दिया है कि न्यायालय ने अपराध की गंभीरता को प्राथमिकता दी है, और भविष्य में सभी सम्बंधित पक्षों को इस प्रकार के कृत्यों से बचने की दिशा में ठोस कदम उठाने की अपेक्षा रखी है।
Published: May 4, 2026