हरियाणा में पवित्र वन पहचान अभियान: प्रशासनिक सरसरी कार्रवाई की जांच
हिंदुस्तान के उत्तर‑पश्चिमी राज्य हरियाणा ने आज से "पवित्र वन" (सेंट्रीड ग्रोव) की पहचान के लिये व्यापक सर्वेक्षण शुरू किया। राज्य के वन तथा जलवायु विभाग के मुख्य सचिव ने कहा कि एसे लगभग 3,000 से अधिक स्थल प्रदेश में बिखरे हुए हैं, परन्तु अब तक किसी भी स्वरूप में उनका औपचारिक मानचित्रण नहीं हुआ।
पवित्र वन पारम्परिक रूप से गांव‑समुदायों द्वारा धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठानों के लिये सुरक्षित रखे जाते हैं। वे न केवल जैव विविधता के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, बल्कि जल पुनर्भरण एवं वायुमंडलीय संतुलन में भी योगदान देते हैं। फिर भी कई वर्षों तक इनका कोई सरकारी दर्जा नहीं मिला, जिससे अनधिकृत कटाई, बागवानी के लिये ज़मीनी अधिग्रहण और विकास परियोजनाओं के चलते इनका निरंतर क्षय हुआ।
सरकार की इस नई पहल को नगरपालिका एवं पिंड स्तर पर स्वागत मिला, पर उससे पहले की लापरवाह नज़रअंदाज़ी पर सवाल उठाने वाले स्थानीय पर्यावरण समूहों का कहना है कि "जब तक पेड़ गिरते रहे, तब तक मानचित्र नहीं बने"। वे आरोप लगाते हैं कि विभागीय रिपोर्टिंग और ग्राउंड‑लेवल डेटा संग्रह में लम्बी देरी, अभिलेखीय असंसाधन और बजट आवंटन की तुच्छता ने इस स्थिति को जन्म दिया।
एकाधिक पंचायतों ने यह भी बताया कि कुछ पवित्र वनों को पिछले दो दशकों में टोल‑फ़ी चौराहों, हाई‑वे और औद्योगिक इकाइयों के लिये नियोजित किया गया था। उस समय स्थानीय प्रतिनिधियों की शिकायतों को अक्सर "विकास के हित में" खारिज किया जाता रहा। अब प्रशासन का यह सर्वेक्षण, जिसमें ड्रोनों एवं GIS तकनीक का उपयोग किया जायेगा, संभावित रूप से इन अभिलक्षित क्षेत्रों को आधिकारिक सूची में सम्मिलित करने का लक्ष्य रखता है।
परन्तु वास्तविक प्रभाव तभी होगा जब इस पहचान के बाद राज्य सरकार इन स्थलों को कानूनी सुरक्षा दे और पुनर्स्थापन हेतु आर्थिक एवं तकनीकी सहायता प्रदान करे। वर्तमान में योजना के कार्यान्वयन में मानव संसाधन की कमी, डेटा सत्यापन के लिये स्थानीय ज्ञान की अपर्याप्तता और समयसीमा की लापरवाही के कारण आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
नागरिकों के लिये इस पहल का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि भविष्य में पवित्र वनों को पर्यटन, सामुदायिक जल संग्रहण और शिक्षा के केंद्र के रूप में विकसित किया जा सके। लेकिन अगर इस पहचान को केवल आंकड़ों तक सीमित रखा गया, तो यह कदम केवल कागज़ी कार्रवाई में ही समाप्त रह सकता है।
संक्षेप में, हरियाणा का पवित्र वन पहचान अभियान पर्यावरणीय संरक्षण के प्रति एक सकारात्मक संकेत है, परन्तु प्रशासन को इसको केवल सर्वेक्षण तक सीमित नहीं रखना चाहिए। बिना ठोस सुरक्षा प्रावधान, पुनर्स्थापन योजना और स्थानीय सहभागिता के यह पहल केवल सतह पर चमकते सितारे जैसा रह जाएगा।
Published: May 4, 2026