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हाई कोर्ट ने बीएनएसएस के तहत अनुपस्थिति में मुकदमा चलाने के लिए विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित की
दिल्ली के उच्च न्यायालय ने इस हफ्ते बीएनएसएस (बेसिक नेशनल सेवाओं स्कीम) के तहत चलाए जाने वाले अनुपस्थिति मुकदमों के लिए चरण दर चरण नियमावली प्रकाशित की। इस आदेश से नगर प्रशासन, न्यायिक कार्यवाही और आम नागरिकों के बीच की दूरी को कुछ हद तक कम करने की उम्मीद है, परंतु इससे नई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ेगा।
बीएनएसएस, जिसका उद्देश्य शहरी बुनियादी सुविधाओं के विकास को तेज़ी से लागू करना था, कई बार अनुशासनहीन फाइलों और अनुपस्थित उत्तरदायियों के कारण जटिलता में बदल गया। उच्च न्यायालय ने इस समस्या को देखते हुए तीन प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश डाला: (i) सूचित करने की विधि, (ii) अनुपस्थिति साबित करने की शर्तें, और (iii) न्यायिक निर्णय के बाद पुनर्विचार का प्रावधान।
पहला कदम — सूचनात्मक प्रक्रिया — में प्रतिवादी को इलेक्ट्रॉनिक माध्यम, टेलिफोन और पंजीकृत डाक द्वारा विस्तृत नोटिस भेजने का निर्देश दिया गया है। नोटिस में स्पष्ट रूप से 15 दिनों की जवाबदेही अवधि और यदि उत्तर न दिया गया तो केस के स्वचालित रूप से आगे बढ़ने की सूचना शामिल होगी। यह कदम प्रशासनिक लापरवाही से बचने के लिए तकनीकी भरोसे को बढ़ाता है, हालांकि शहरी क्षेत्रों में डिजिटल असमानता को देखते हुए यह एक संभावित उलटफेर बन सकता है।
दूसरा चरण — अनुपस्थिति सिद्ध करना — में कोर्ट को प्रमाणित करना होगा कि प्रतिवादी ने वास्तविक प्रयासों के बावजूद भी जवाब नहीं दिया। इसमें साक्ष्य के रूप में कॉल रिकॉर्ड, डाक रिटर्न नोटिस और सामाजिक मीडिया स्क्रीनशॉट को मान्यता दी गई है। न्यायिक प्रक्रिया में यह कदम एक तरह का ‘आदर्श सत्यापन’ बनाता है, जो पूर्व में अनियमित “डरावनी” अवधारणा को हटाकर तथ्यों पर आधारित कार्यवाही सुनिश्चित करता है।
तीसरा नियम — पुनर्विचार का प्रावधान — प्रतिवादी के मान्य कारणों (जैसे स्वास्थ्य समस्याएँ या प्राकृतिक आपदाएँ) को मान्यता देता है और समुचित समयावधि में पुनः सुनवाई का अवसर प्रदान करता है। इस पहल से न्यायपालिका को ‘सख़्त लेकिन संवेदनशील’ कहा जा सकता है, परंतु यह भी सवाल खड़ा करता है कि किस हद तक प्रशासनिक दायरों को पुनरावृत्ति के समय में उलझन में डालेंगे।
नगर प्रशासन के प्रमुख अधिकारी इस आदेश को “कानूनी रूप से स्पष्ट” बताते हुए कहा कि अब बेकार की दायरियों को समाप्त कर संसाधनों को वास्तविक विकास कार्यों पर लगाना संभव होगा। हालांकि, असंतुष्ट नागरिक समूह इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि अनुपस्थितियों के कारण तेज़ी से निर्णय लेने की प्रक्रिया में व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।
परिणामस्वरूप, बीएनएसएस के तहत चल रहे कई लंबित प्रोजेक्टों को अब स्पष्ट समय‑सीमा के भीतर समाप्त करने की संभावना है। फिर भी, यह नियमावली इस बात की याद दिलाती है कि न्यायिक तंत्र की ‘कुशलता’ तभी सच्ची होगी जब प्रशासनिक प्रबंधन, तकनीकी साधनों और सामाजिक संवेदनशीलता में सुसंगतता हो।
Published: May 8, 2026