विज्ञापन
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?
आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें।
हाई कोर्ट ने गवर्नर‑वीसी के विस्तृत नामांकन अधिकारों पर नोटिस जारी किया
हैदराबाद स्थित हाई कोर्ट ने आज एक आधिकारिक नोटिस जारी कर राज्य गवर्नर और विश्वविद्यालय उपकुलपति (वीसी) को दी गई विस्तृत नामांकन शक्तियों को चुनौती दी है। नोटिस में कहा गया है कि मौजूदा नियमावली के तहत गवर्नर को विश्वविद्यालय के विभिन्न बोर्डों में सदस्य चयन करने का अधिकार दिया गया था, परंतु हाल ही में किए गए संशोधन ने इस अधिकार को ‘व्यापक’ कर दिया है, जिससे प्रशासनिक संतुलन में असंगति उत्पन्न हो रही है।
इस विवाद की जड़ में राज्य सरकार‑विश्वविद्यालय के बीच हुए एक समझौते का संशोधित प्रावधान है, जिसमें गवर्नर को सभी स्वायत्त संस्थानों के स्नातक एवं पोस्ट‑ग्रेजुएट कार्यक्रमों के लिए चयन समिति के सदस्यों की नियुक्ति पर व्यापक अधिकार दिया गया है। उपकुलपति को अब इन नामांकन में ‘परामर्शी’ भूमिका से ‘निर्णायक’ भूमिका में बदला गया है। विश्वविद्यालयीय विद्वानों और छात्र संगठनों ने इस परिवर्तन को ‘सरकारी हस्तक्षेप के तहत शैक्षणिक स्वतंत्रता की कीमत पर’ नामांकित किया है।
हाई कोर्ट के नोटिस में यह स्पष्ट किया गया है कि चाहे नियामक प्रावधान को संशोधित करने का कार्य विधायिका से आया हो, उसका पार्श्वीय प्रभाव संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) – शिक्षा की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, तथा अनुच्छेद 33 – विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, के अनुरूप होना चाहिए। यदि व्यापक नामांकन शक्ति वास्तव में ‘संकाय, छात्रों और समाज’ के हित में नहीं, बल्कि ‘राजनीतिक संतुलन’ को बनाए रखने के लिए प्रयोग की जा रही है, तो यह न्यायिक निरिक्षण के दायरे में आएगी।
प्रशासनिक स्तर पर राज्य सरकार ने इस नोटिस को ‘सामान्य प्रक्रिया‑समीक्षा’ के रूप में स्वीकार किया है और कहा है कि कोई भी अपरिवर्तित निर्णय कोर्ट के अंतिम आदेश के बाद ही लागू होगा। विश्वविद्यालय के प्रशासन ने वर्तमान में नियुक्ति प्रक्रिया को स्थगित कर दिया है, जिससे कई खाली पद अभी भी अप्रचलित हैं। परिणामस्वरूप, छात्रों को मार्गदर्शन संक्षेप में देरी, ग्रेडिंग में बाधा, और शोध परियोजनाओं में आवश्यक संसाधन तक पहुंच में असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
जैसे ही न्यायालय इस मुद्दे को सुनने के लिए तिथि निर्धारित करेगा, शैक्षणिक संस्थानों के भीतर प्रशासनिक दक्षता और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के बीच का संतुलन फिर से जांचा जाएगा। यह मामला न केवल हैदराबाद के ओस्मानिया विश्वविद्यालय के लिए, बल्कि पूरे राज्य में सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के स्वायत्तता‑प्रबंधन मॉडल के लिए एक महत्वपूर्ण मापदण्ड बन सकता है।
सम्पूर्ण रूप से, नोटिस ने यह सिद्ध कर दिया है कि शक्ति का विस्तार केवल कागज़ी रूप में नहीं होना चाहिए; उसे वास्तविक कार्यान्वयन में नागरिक‑हित तथा संस्थात्मक स्वतंत्रता के साथ जुड़ना अनिवार्य है। हाई कोर्ट का यह कदम प्रशासनिक अति‑सततता के प्रति एक सावधान चेतावनी के रूप में पढ़ा जा सकता है, जिससे भविष्य में समान प्रावधानों पर पूर्वाभासित‑न्यायिक समीक्षा संभव हो सकेगी।
Published: May 9, 2026