सरकार ने जैविक खेती को बढ़ावा, रासायनिक फसलों पर की कड़ी चेतावनी
नई दिल्ली के कृषि विभाग ने आज एक आधिकारिक बयानों में जैविक खेती को प्राथमिकता देने का आश्वासन दिया, साथ ही रासायनिक इनपुट्स पर सख्त रोक लगाने की घोषणा की। इस दिशा-निर्देश में किसानों को बीज, उर्वरक और कीटनाशकों के विकल्प के रूप में प्रमाणित जैविक उत्पादों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये सब्सिडी, प्रशिक्षण और फसल बीमा का समुचित प्रावधान किया गया।
उपायों में विशेष रूप से छोटे एवं सीमांत किसानों को 30 प्रतिशत तक की वित्तीय सहायता, ‘जैविक किसान हेल्पलाइन’ की स्थापना और दो साल के लिये मार्केट लिंकज योजना शामिल है। विभाग का कहना है कि इन कदमों से न केवल कृषि उत्पादन में स्थिरता आएगी, बल्कि उपभोक्ताओं को स्वस्थ भोजन भी उपलब्ध होगा।
हालाँकि, इस घोषणा पर कई स्तरों पर सवाल उठे हैं। प्रशासनिक कार्रवाई के बावजूद, पिछले पाँच वर्षों में जैविक खेती के लिए बुनियादी ढाँचे की गैप अभी भी बड़ी रही है; प्रमाणन सुविधा से लेकर संग्रह‑परिवहन तक का सारा तंत्र अधूरा है। विशेषज्ञों का तर्क है कि केवल आर्थिक प्रोत्साहन पर्याप्त नहीं, और वास्तविक परिवर्तन के लिये निरंतर तकनीकी समर्थन व बाजार‑सम्पर्क की आवश्यकता है।
नागरिकों ने भी इस नीति के संभावित प्रभाव को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ दी हैं। उपभोक्ता संगठनों ने रासायनिक प्रवेष को कम करने की सराहना की, परन्तु वे आशंकित हैं कि आधिकारिक चेतावनी के बाद भी बाजार में ‘केमिकल‑लूटेड’ उत्पादों का प्रचलन बनी रहेगी। कई किसान समूहों ने कहा कि अचानक रासायनिक इनपुट्स पर प्रतिबंध से उत्पादन में गिरावट का जोखिम है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ जलवायु‑पर्यावरणीय स्थितियां अभी तक जैविक विधियों के अनुकूल नहीं हुईं।
व्यवस्था की आलोचना में यह भी शामिल है कि विभाग ने इस नीति का वित्तीय बोझ किसके ऊपर डालना है, यह स्पष्ट नहीं किया। यदि सब्सिडी का ऋण भार राज्य को उठाना पड़ेगा, तो सार्वजनिक सेवाओं की अन्य प्राथमिकताओं पर असर पड़ सकता है। इस बात का संकेत भी मिला है कि पिछले कई वर्षों में कई राज्य कृषि योजनाओं का “बयान तो हुआ, पर जमीन पर कार्यान्वयन नज़र नहीं आया” की आलोचना अक्सर सुनने को मिलती रही है।
संक्षेप में, सरकार की जैविक खेती को समर्थन देने की पहल सराहनीय प्रतीत होती है, परन्तु वास्तविकता में इसे सफल बनाने के लिये बुनियादी ढाँचे, निरंतर निगरानी और स्पष्ट जिम्मेदारी‑निर्धारण आवश्यक है। तभी किसान, उपभोक्ता और प्रशासन के बीच संतुलित तालमेल बन पाएगा, अन्यथा नीति केवल कागज पर ही रहकर ‘वादा’ बन जाएगी।
Published: May 6, 2026