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सूरत के नेय्ट परीक्षा केंद्र में कांथी हटाने को लेकर छात्र-अभ्यर्थियों में उभरा तमाशा

गुजरात के व्यापारिक हब सूरत में 4 मई को नेशनल एग्ज़ामिनेशन एंव एंट्रेंस टेस्ट (NEET) के मुख्य परीक्षा केंद्र में एक अनपेक्षित विवाद ने स्थानीय प्रशासन और पुलिस को अजनबी मोड़ पर ला दिया। परीक्षा कक्ष में बैठी कई महिला अभ्यर्थियों के सिर पर पारम्परिक धार्मिक प्रतीक ‘कांथी’ (रक्षा हेतु धारण किया गया धागा) को परीक्षा निरीक्षक ने हटाने का निर्देश दिया, जिससे अभ्यर्थियों, उनके अभिभावकों और स्थानीय दर्शकों में तीखा विरोध हुआ।

कानूनी तौर पर NEET में किसी भी प्रकार का बाहरी वस्तु, जिसमें धूप के चश्मे, पिन, या धार्मिक संकेत शामिल हैं, प्रतिबंधित है—यह नियम भारतीय मेडिकल काउंसिल द्वारा जारी किया गया है। लेकिन इस नियम के व्याख्यान में अंतर स्पष्ट नहीं रहा, क्योंकि कांथी को न केवल धार्मिक मान्यता के साथ बल्कि कई परिवारों ने इसे स्वास्थ्य के प्रतीक के रूप में भी माना है। परिणामस्वरूप, निरीक्षकों द्वारा इसे ‘अवैध वस्तु’ घोषित कर हटाने के प्रयास को बहुतायत में ‘धर्म के प्रति असंवेदनशीलता’ के रूप में भाँका गया।

परिस्थिति बिगड़ते ही, अभ्यर्थियों ने परीक्षा कक्ष के बाहर भी विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैलते वीडियो में छात्रों की ओर से लपटों जैसी आवाज़ें और कुछ अनपेक्षित कलेक्टिव बैनर दिखाई दे रहे थे, जिसमें लिखा था – “धर्म का सम्मान करें, परीक्षा में मनुष्य बनें”। पुलिस ने तुरंत घटना स्थल पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश की, परन्तु भीड़ नियंत्रण के साधन—जैसे फुट-ड्रम, बोल्डर—कभी‑कभी ही काम आए। अंततः दो-तीन छात्रों को ‘जवाबदेही’ के तहत निलंबित करने का आदेश दिया गया, जबकि अन्य को शांति से बाहर निकालने के लिए एक अस्थायी मार्गदर्शन बनाया गया।

सूरत नगर निगम के सार्वजनिक कार्य विभाग ने इस घटना को ‘अनपेक्षित प्रशासनिक लापरवाही’ कहकर अपने आप में उत्तर दिया। नगर महानगर निगम के अधिकारी ने कहा, “हमने तुरंत परीक्षा अधिकारी को निर्देश दिया कि भविष्य में सभी परीक्षा केंद्रों में धार्मिक प्रतीकों के बारे में स्पष्ट दिशा‑निर्देश जारी किए जाएँ, जिससे परीक्षा‑पर्यावरण में कोई भ्रम न रहे।” वहीं, गुजरात राज्य शिक्षा विभाग ने एक बयान में कहा कि “सभी नियामक संस्थाओं को NEET की परीक्षा जागरूकता में स्पष्टता लानी चाहिए, ताकि इस प्रकार के टकराव से बचा जा सके।”

इस छोटे‑से विवाद ने कई बड़े प्रश्न उठाए: क्या भारत में राष्ट्रीय स्तर के प्रवेश परीक्षाओं में धार्मिक संवेदनशीलताओं को नजरअंदाज करना संभव है? क्या प्रशासनिक नियमों को स्थानीय सांस्कृतिक प्रथाओं के साथ समन्वित करने का कोई ठोस ढाँचा मौजूद है? और सबसे महत्वपूर्ण, इस तरह की घटनाओं का प्रभाव छात्रों की मानसिक तैयारियों पर कितना पड़ता है—जब परीक्षा के तनाव में अतिरिक्त ‘धार्मिक तनाव’ झड़प जोड़ दिया जाए।

जहाँ तक तत्काल प्रभाव की बात है, इस रुक्स को लेकर सूरत पुलिस ने साबित किया कि “ख़ासकर बड़े शहरों में, किसी भी छोटी‑सी बात को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने के बजाय, कार्यवाही में त्वरित और स्वच्छता पर ध्यान देना चाहिए।” लेकिन यह भी स्वीकार किया गया कि ‘नियमों के सख्त अनुपालन’ और ‘सामाजिक सहिष्णुता’ के बीच संतुलन बनाना अब एक ‘सभी‑के‑लिए‑सहज’ नियम बन गया है, जिस पर अधिक स्पष्ट मार्गदर्शन की आवश्यकता है।

अगले सप्ताह के भीतर निर्धारित NEET पुनः परीक्षा की तिथि नजदीक आ रही है। यदि इस तरह की समस्याएँ दोहराई गईं तो विद्यार्थियों को न केवल अपने भविष्य की चिंता, बल्कि सामाजिक‑धार्मिक असंतोष का दोहरा बोझ झेलना पड़ेगा। स्थानीय प्रशासन को अब यह स्पष्ट करना होगा कि वह ‘पर्यापरता’ को नहीं, बल्कि ‘परिवर्तनशीलता’ को अपनाते हुए, छात्रों को एक निष्पक्ष एवं सांस्कृतिक रूप से सम्मानित परीक्षा माहौल प्रदान करने के लिये क्या कदम उठाएगा।

Published: May 4, 2026