स्टुटगर्ट में महाराष्ट्र हाउस का उद्घाटन 1.5 वर्ष बाद भी रुका, केंद्र की अनुमति मलबा बन गई
जर्मनी के व्यापारिक शहर स्टुटगर्ट में स्थित महाराष्ट्र हाउस का भव्य उद्घाटन कार्य अगस्त 2024 में आयोजित किया गया था। इस परिसर को भारत‑जर्मनी व्यापार, सांस्कृतिक सहयोग और प्रवासी भारतीयों के लिये एक सहायक केंद्र के रूप में डिजाइन किया गया था। परन्तु आज 4 मई 2026 को, लगभग डेढ़ साल बीतने के बाद भी भवन खाली पड़े खिड़कियों के पीछे सिर्फ़ धूल के कणों को ही गूँजता सुनाई देता है।
विलंब के प्रमुख कारण के रूप में महाराष्ट्र सरकार ने केंद्रीय विदेश मंत्रालय (MEA) से आवश्यक ‘ऑपरेशन लायसेंस’ प्राप्त न होने को बताया है। आधिकारिक तौर पर, विदेश मंत्रालय को भवन की सुरक्षा, कूटनीतिक मानकों और द्विपक्षीय समझौतों की जाँच करनी थी; परन्तु दस्तावेज़ी प्रक्रिया में इतनी लगनशीलता देखी गई कि कागज़ी काम की रफ़्तार पर दो बाघों के दौड़ने का भी भरोसा नहीं किया जा सकता।
यह देरी केवल कागज़ी औपचारिकता तक सीमित नहीं है। प्रदेश सरकार ने इस केंद्र को महाराष्ट्र के छोटे और मध्यम उद्योगों को यूरोपीय बाजार में प्रवेश दिलाने, तकनीकी सहयोग बढ़ाने और प्रवासी भारतीयों को वैध सरकारी सहायता प्रदान करने के प्रमुख साधन के रूप में दर्शाया था। अब, इन योजनाओं को व्यवहार में उतारने का कोई साधन नहीं रह गया, जिससे संभावित निर्यातकों और स्टार्ट‑अप्स को आर्थिक अवसरों का नुकसान हो रहा है।
स्टुटगर्ट में स्थित भारतीय समुदाय के प्रमुख प्रतिनिधियों ने इस पर “भ्रष्ट सर्किट” के समान एक टिप्पणी की है, यह संकेत देते हुए कि स्थानीय व्यापारियों को अब भी अनिश्चितता के साए में अपनी योजनाएँ बनानी पड़ रही हैं। कुछ व्यापारी ने बताया कि विदेश मंत्रालय से मिलने वाली देर से मिली स्वीकृति के कारण उन्होंने जर्मन साझेदारियों को वैकल्पिक यूरोपीय नगरों की ओर मोड़ दिया है, जिससे महाराष्ट्र हाउस का मूल उद्देश्य व्यर्थ रहा।
ऐतिहासिक तौर पर, भारत के कई अन्य विदेश मिशनों में इसी तरह के बुनियादी ढांचा परियोजनाएँ कम से कम समय में खुली हैं। उदाहरण के रूप में, लंदन में स्थापित ‘केन्याबाज़ार’ और सिंगापुर में ‘भारत व्यापार केंद्र’ को एक साल के भीतर कार्यवाही में लाया गया था। इस तुलना से यह स्पष्ट होता है कि केंद्र-राज्य समन्वय में वर्तमान अडचन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक जड़ता की ओर इशारा करती है।
महाराष्ट्र सरकार ने विदेश मंत्रालय से “जल्दी से जल्दी आवश्यक स्वीकृति प्रदान करने” का अनुरोध किया है, साथ ही केंद्र को इस बात का आश्वासन दिया गया है कि राज्य अपने संसाधनों और मानवीय शक्ति से इस परियोजना को तुरंत शुरू करने के लिये तैयार है। परन्तु, यदि अगले महीने तक भी कोई औपचारिक मंजूरी नहीं मिलती, तो यह केंद्र केवल एक “भविष्य का खंडहर” बनकर रह सकता है, जिससे ना केवल राज्य के आर्थिक लक्ष्य, बल्कि भारत‑जर्मनी मित्रता की वास्तविक उपयोगिता भी प्रश्नचिह्न में आ जाएगी।
Published: May 4, 2026