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Category: शहर

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रात के समय झोपड़ी में लगी आग से झाड़ीउद्योगी की मौत, नगरपालिका की चुप्पी पर सवाल

नई दिल्ली—गुज़रते शनिवार रात करीब दो बजे, उत्तर दिल्ली के एक झोपड़ी वाले बस्ती में अचानक झाड़ीउद्योगी राम सिंह (२७) की मृत्यु हुई, जब आग के धुएँ ने उनके छोटे से सरायघर को engulf कर दिया। अग्निशामक दल को देर रात 02:30 बजे बुलाई गई, परंतु धुआँ पहले ही अधिकांश निवासियों के घोंसलों को निगल चुका था।

स्थानीय पुलिस ने प्राथमिक जांच में आग का कारण बिंदु-ट्रॉय के दोषपूर्ण विद्युत कनेक्शन और अव्यवस्थित कचरा ढेर से जोड़ते हुए, संभवतः एक स्पार्क से शुरू हुई जलन को प्राथमिक कारण के रूप में दर्ज किया। यह वही बस्ती है जहाँ पिछले साल कई बार नगरपालिका द्वारा अनैतिक कचरा संग्रहण की शिकायतें दर्ज हुई थीं, परंतु कोई ठोस उपाय नहीं किया गया।

रायपुर नगर निगम (एनसी) के एक प्रवक्ता ने कहा, "इस दुखद घटना पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए, हम पूरी जांच करेंगे और पीड़ित परिवार को उचित नुकसानभराई प्रदान करेंगे।" लेकिन समान बस्तियों में कई वर्षों से चलते आ रहे उपायहीनता के खिलाफ नागरिकों ने आवाज़ उठाई है। बस्ती के अध्यक्ष पवन कुमार ने कहा, "हमने बार‑बार नगरपालिका को कचरा जमा करने की अनियंत्रित प्रथा और बिजली के असुरक्षित कनेक्शन की शिकायत की, पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।"

पुलिस ने तत्काल FIR दर्ज कर, अग्निशामक दल के साथ मिलकर कारणों की विस्तृत जाँच का आदेश दिया। नगर निगम ने अगले दिन एक अड‑हॉक समिति बनाकर, बस्ती में अग्नि सुरक्षा उपाय, कचरा प्रबंधन और निवासियों को वैकल्पिक रोजगार प्रदान करने की योजना को शीघ्र निष्पादित करने का आश्वासन दिया। साथ ही, राम सिंह के परिवार को ₹५ लाख की क्षतिपूर्ति की पेशकश की गई, जिसे उन्होंने अभी तक स्वीकार नहीं किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि झोपड़ी बस्तियों में अनौपचारिक आर्थिक गतिविधियों—जैसे झाड़ी एकत्रण—पर निर्भरता, बुनियादी ढाँचे की कमी और नगर नियोजन के अभाव को उजागर करती है। एक सामाजिक वैज्ञानिक ने टिप्पणी की, "जब तक बस्तियों को मूलभूत स्वच्छता, सुरक्षित बिजली और जीवन‑रक्षा उपकरण नहीं दी जाती, ऐसी घटनाएँ मात्र संयोग नहीं बल्कि प्रणालीगत अपारदर्शिता के संकेत होंगी।"

इस घटना ने फिर से इस बात को रेखांकित किया है कि शहरी विकास के बड़े‑बड़े मौकों पर, असंगठित बस्तियों को पैसों की बजाय नीति‑निर्माण मंच में सुनना चाहिए। अन्यथा, अगली बार धुआँ उठते‑उठते नगरपालिका की चुप्पी भी फेरेगा—और वह धूमिल नहीं, बल्कि धुएँ में ढँका रहेगा।

Published: May 7, 2026