मुंबई में 41 साल बाद हत्या‑और दंगे के केस में आरोपी को मिली रिहाई
मुंबई उच्च न्यायालय ने आज 41 साल पुरानी हत्या और दंगे के मामले में राजेश कुमार (58) को रिहा कर दिया। 1985 में मुंबई में भड़के सांप्रदायिक दंगों के बीच गिरफ्तार हुए कुमार को 1990 में जीवनदंड की सजा सुनाई गई थी, लेकिन अदालत ने इस बार प्रोसिक्यूशन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य‑फ़ाइल में कई प्रक्रियात्मक त्रुटियों की ओर इशारा करते हुए उसे बरी कर दिया।
कुशलता के नाम पर कई बार देरी से चल रहे न्यायालय की फाइलें अब फिर से जांच के दायरे में आ गईं। इस बार उच्च न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने मूल साक्ष्य‑फ़ाइल में मौजूद कई दस्तावेज़ों को सही तरह से प्रस्तुत नहीं किया, जिससे मूल सुनवाई में न्याय पूर्ण नहीं किया जा सका। “फ़ाइलें तो तहखाने में धूल के पीछे थीं,” एक जज ने हल्के‑फुल्के अंदाज़ में टिप्पणी की, जो न्यायिक प्रक्रिया में व्याप्त अराजकता को दर्शाती है।
मामले की शुरुआत 1985 में हुई थी, जब मुंबई में साम्प्रतिक दंगे ने 12 लोगों की जान ले ली और कईयों को गंभीर रूप से जख्मी किया। उस समय पुलिस ने कई अनुशंसित व्यक्तियों को हिरासत में ले लिया, जिनमें राजेश कुमार भी शामिल थे। 1990 में उनके खिलाफ साक्ष्य‑बिंबुत्री को पर्याप्त माना गया और उन्हें सजा सुनाई गई। अब यह रिहाई न केवल आरोपी के परिवार को राहत प्रदान करती है, बल्कि उन पीड़ितों के परिवारों को गहरी असहजता में डालती है, जिन्हें दो दशकों से अपने खोए हुए सदस्यों के न्याय की आशा रही थी।
शहर के प्रशासनिक निकायों ने अभी तक इस फैसले पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं दी है। हालांकि, नागरिक समाज के समूहों ने रिहाई को ‘प्राकृतिक न्याय की विफलता’ कहा है और माँगा है कि प्रतिबंधित दायित्वों की पूर्ति के साथ साथ, पीड़ितों को उचित मुआवजा दिया जाए। यह मामले कानूनी प्रक्रिया में लम्बरत्व, फाइलों के संरक्षण की लापरवाहियां और पुलिस जांच की अपर्याप्तता को उजागर करता है, जो अक्सर “कभी‑कभी” के बहाने से टाल दिए जाते हैं।
कुल मिलाकर यह घटना दर्शाती है कि न्यायपालिका की धीमी गति और प्रशासनिक लापरवाही के कारण कई मामलों में समय ही सबसे बड़ा दंड बन जाता है। न्यायालय को आशा है कि इस प्रकरण से भविष्य में साक्ष्य‑प्रबंधन और केस‑फ़ाइल के रखरखाव में सुधार होगा, ताकि अगली पीढ़ी को “41 साल बाद न्याय” का इंतजार न करना पड़े।
Published: May 4, 2026